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550 साल पुरानी है बंगाल की चंद्रपुली मिठाई? दुर्गापूजा के इस खास पकवान का इतिहास जानकर चौंक जाएंगे

Moutushi · 20 October 2026, 11:48 AM

कोलकाता, बिकाश चंद्र, सिटी टुडे न्यूज़: दुर्गापूजा का नाम आते ही बंगाल की भव्य प्रतिमाओं, आकर्षक पूजा पंडालों, पारंपरिक परिधानों और स्वादिष्ट पकवानों की तस्वीर सामने आ जाती है। पूजा के दौरान बनने वाली मिठाइयों में चंद्रपुली का अपना अलग स्थान है। नारियल, दूध से बने गाढ़े खोए, चीनी और सुगंधित मसालों से तैयार होने वाली यह पारंपरिक मिठाई केवल स्वाद के लिए ही नहीं, बल्कि बंगाल की सांस्कृतिक विरासत के लिए भी खास मानी जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि चंद्रपुली की परंपरा लगभग साढ़े पांच सौ साल पुरानी हो सकती है? मध्यकालीन बांग्ला काव्य में मिलने वाले उल्लेख इस मिठाई के इतिहास की एक दिलचस्प तस्वीर पेश करते हैं।

चंद्रपुली के इतिहास का साहित्य से क्या है संबंध?

चंद्रपुली की प्राचीनता का पता लगाने के लिए पुराने बांग्ला साहित्य की ओर देखना पड़ता है। मध्यकालीन बंगाल में रचे गए मंगलकाव्य केवल धार्मिक कथाओं तक सीमित नहीं थे। उनमें उस समय के सामाजिक जीवन, पारिवारिक संबंधों, विवाह समारोहों, खानपान और लोकपरंपराओं की झलक भी मिलती है। इसी वजह से इन काव्य ग्रंथों में भोजन से जुड़े उल्लेख इतिहास और संस्कृति को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार बनते हैं।

चंद्रपुली के संदर्भ में ‘मनसाविजय’ और ‘पद्मपुराण’ जैसे काव्य ग्रंथों का विशेष महत्व बताया जाता है। इन रचनाओं में मिठाइयों और पारंपरिक पकवानों के उल्लेख से संकेत मिलता है कि नारियल से बनने वाली मिठाइयां मध्यकालीन बंगाल के खानपान का हिस्सा थीं। हालांकि, किसी मिठाई का साहित्य में उल्लेख मिलने और उसके वास्तविक आविष्कार का समय एक ही होना जरूरी नहीं है। इसलिए इसकी उम्र को एक ऐतिहासिक अनुमान के रूप में समझना अधिक उचित होगा।

‘मनसाविजय’ में मिलता है पुरानी मिठाई का संकेत

बंगाली साहित्य के इतिहास में ‘मनसाविजय’ को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। उपलब्ध ऐतिहासिक चर्चाओं के अनुसार, इस काव्य की रचना का समय लगभग 15वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों के आसपास माना जाता है। इसी कालखंड में चंद्रपुली जैसी पारंपरिक मिठाई का उल्लेख मिलने की बात सामने आती है।

इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण बात यह है कि चंद्रपुली का इतिहास केवल रसोई की परंपरा से नहीं, बल्कि साहित्य में सुरक्षित खाद्य संस्कृति से भी जुड़ा हुआ है। पुराने कवियों ने अपने समय में प्रचलित भोजन और पकवानों का वर्णन किया। ऐसे उल्लेखों से पता चलता है कि उस दौर में लोगों के खानपान में विविधता थी और मिठाइयां सामाजिक तथा पारिवारिक आयोजनों का हिस्सा थीं।

यदि 15वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में इस मिठाई का उल्लेख मिलता है, तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इसके बनने और लोकप्रिय होने की परंपरा उससे कुछ पहले से चली आ रही होगी। हालांकि, इसका सटीक आरंभिक वर्ष अभी निश्चित रूप से बताना संभव नहीं है।

द्विज बंशীদास के ‘पद्मपुराण’ में चंद्रकाइट का उल्लेख

चंद्रपुली की प्राचीनता पर चर्चा करते समय कवि द्विज बंशীদास की रचना का उल्लेख भी महत्वपूर्ण है। उनके ‘पद्मपुराण’ को बंगाल के मनसामंगल काव्य की परंपरा से जोड़ा जाता है। इस रचना में भोजन और मिठाइयों के संदर्भ में ‘चंद्रकाइट’ नाम का उल्लेख मिलता है। ऐतिहासिक व्याख्या के अनुसार, यह नाम घी में तली जाने वाली चंद्रपुली से संबंधित हो सकता है।

इससे एक दिलचस्प संभावना सामने आती है कि बंगाल और वर्तमान बांग्लादेश के विभिन्न क्षेत्रों में एक ही तरह की मिठाई के नाम और बनाने के तरीकों में अंतर रहा होगा। लोकभाषा, स्थानीय सामग्री और पारिवारिक परंपराओं के अनुसार पकवानों के नाम बदलना असामान्य नहीं है।

यह उल्लेख इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पता चलता है कि उस समय मिठाइयों की विविधता मौजूद थी। हालांकि, ‘चंद्रकाइट’ और आज प्रचलित चंद्रपुली को पूरी तरह एक ही रूप मानने के लिए मूल काव्य पाठ, उसके ऐतिहासिक संदर्भ और पाक-विधि का सावधानीपूर्वक अध्ययन आवश्यक है।

नारायणदेव के ‘पद्मपुराण’ से भी जुड़ता है इतिहास

नारायणदेव के ‘पद्मपुराण’ की रचना का समय लगभग 1510 ईस्वी बताया जाता है। यह समय ‘मनसाविजय’ से जुड़े कालखंड के आसपास पड़ता है। इस आधार पर चंद्रपुली, चंद्रपुली पीठा और चंद्रकांति पीठा जैसे नामों और पकवानों के बीच ऐतिहासिक संबंध की संभावना पर चर्चा की जाती है।

यहां एक सावधानी जरूरी है। अलग-अलग क्षेत्रों में समान सुनाई देने वाले नामों से बने पकवानों की सामग्री और बनाने की विधि अलग हो सकती है। इसलिए केवल नाम की समानता के आधार पर सभी मिठाइयों को एक ही व्यंजन का रूप मान लेना उचित नहीं होगा। फिर भी, इन उल्लेखों से पूर्वी भारत की पारंपरिक मिठाई संस्कृति की विविधता का पता चलता है।

पहले के साहित्य में नारियल की मिठाइयों का उल्लेख क्यों महत्वपूर्ण है?

बांग्ला साहित्य के दो चर्चित पुराने ग्रंथ ‘श्रीकृष्णकीर्तन’ और ‘चर्यापद’ में नारियल से बनी मिठाइयों के स्पष्ट उल्लेख की उपलब्धता को लेकर सावधानी बरतनी पड़ती है। इन ग्रंथों में ऐसे उल्लेख न मिलने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उस समय नारियल की मिठाइयां बनाई ही नहीं जाती थीं। संभव है कि वे रोजमर्रा के भोजन का हिस्सा रही हों, लेकिन साहित्य में उनका उल्लेख न हुआ हो।

पुराने समय में दूध, दही, मक्खन और गाढ़े दूध से बने व्यंजनों का विशेष महत्व था। बाद के साहित्य में नारियल, गुड़, चीनी और खोए से बनने वाले पकवानों के उल्लेख से खानपान की विविधता समझने में मदद मिलती है। बंगाल की भौगोलिक परिस्थितियों और नारियल की उपलब्धता ने भी स्थानीय मिठाइयों के विकास में भूमिका निभाई होगी।

कैसे बनती है पारंपरिक चंद्रपुली?

चंद्रपुली की पहचान उसके अर्धचंद्राकार आकार और नारियल की मिठास से जुड़ी है। पारंपरिक विधियों में कद्दूकस किया हुआ नारियल, खोया, चीनी या गुड़ और इलायची जैसी सुगंधित सामग्री का उपयोग किया जाता है। सामग्री को धीमी आंच पर पकाकर गाढ़ा मिश्रण तैयार किया जाता है। इसके बाद उसे आकार देकर मिठाई बनाया जाता है। कुछ परंपराओं में इसे घी में तलने की विधि भी मिलती है।

परिवारों और क्षेत्रों के अनुसार इसकी सामग्री, रंग, बनावट और पकाने के तरीके में अंतर हो सकता है। यही विविधता इस मिठाई को केवल एक पकवान नहीं, बल्कि पीढ़ियों से आगे बढ़ती पाक परंपरा बनाती है।

तो आखिर कितनी पुरानी है चंद्रपुली?

उपलब्ध साहित्यिक संदर्भों और उनके अनुमानित रचनाकाल के आधार पर चंद्रपुली की परंपरा को लगभग साढ़े पांच सौ साल पुराना माना जा सकता है। यह अनुमान इस विचार पर आधारित है कि यदि 15वीं शताब्दी के अंतिम वर्षों के आसपास लिखे गए काव्य में इसका उल्लेख मिलता है, तो मिठाई का प्रचलन उससे कुछ पहले भी रहा होगा।

इस तरह चंद्रपुली को श्री चैतन्य के समकालीन बंगाल की खाद्य संस्कृति से जुड़ी मिठाई कहना उचित हो सकता है। लेकिन इसकी उम्र का कोई निश्चित प्रमाणित वर्ष बताने के बजाय इसे ऐतिहासिक संकेतों पर आधारित अनुमान कहना अधिक सटीक होगा।

दुर्गापूजा के अवसर पर आज भी चंद्रपुली बंगाल की पारंपरिक मिठाइयों में अपनी खास पहचान बनाए हुए है। इसके स्वाद में नारियल और खोए की मिठास के साथ इतिहास, लोकजीवन और पारिवारिक परंपराओं की झलक भी मिलती है। लगभग साढ़े पांच सौ साल पुरानी मानी जाने वाली यह मिठाई याद दिलाती है कि बंगाल की पाक विरासत केवल स्वाद की कहानी नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही संस्कृति का भी हिस्सा है।

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