कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी की सुरक्षा में कटौती का मामला अब कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंच गया है। मंगलवार, ६ अक्टूबर को मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने पश्चिम बंगाल सरकार से सुरक्षा घटाने के फैसले का आधार पूछा और विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि यदि सुरक्षा में कमी के बाद किसी तरह की अप्रिय घटना होती है, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा। अभिषेक बनर्जी की ओर से अदालत में दावा किया गया कि ‘जेड प्लस’ श्रेणी की सुरक्षा हटाए जाने के बाद उन पर चार अलग-अलग हमले हुए। मामले की अगली सुनवाई १३ अक्टूबर को निर्धारित की गई है।
सुरक्षा घटाने के फैसले पर अदालत ने मांगा जवाब
अभिषेक बनर्जी की ओर से अदालत में दलील दी गई कि उन्हें पहले उच्च श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध कराई गई थी, लेकिन वर्ष २०२६ में विधानसभा चुनाव के बाद उनकी सुरक्षा व्यवस्था में अचानक बदलाव कर दिया गया। याचिका के अनुसार, १० मई को उनकी ‘जेड प्लस’ सुरक्षा वापस ले ली गई और सुरक्षा का स्तर घटाकर ‘एक्स’ श्रेणी कर दिया गया।
अभिषेक के वकील ने अदालत में सवाल उठाया कि सुरक्षा हटाने से पहले उन्हें कोई औपचारिक सूचना क्यों नहीं दी गई और इस फैसले का आधार क्या था। सुनवाई के दौरान अदालत ने भी राज्य सरकार से पूछा कि सुरक्षा वापस लेने का आदेश कहां है और इतनी जल्दबाजी में यह कदम क्यों उठाया गया।
रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने इस बात पर भी सवाल किया कि सुरक्षा घटाने का फैसला १० मई को लिया गया, जबकि उसके समर्थन में पेश किए गए आकलन से संबंधित दस्तावेज की तारीख १२ मई बताई गई। इस अंतर को लेकर भी राज्य सरकार से स्पष्टीकरण मांगा गया।
२०१३ से ‘जेड प्लस’ सुरक्षा तक का सफर
सुनवाई के दौरान अभिषेक बनर्जी की ओर से उनकी सुरक्षा व्यवस्था के पुराने विवरण का भी उल्लेख किया गया। उनके वकील शंकरनारायण के अनुसार, वर्ष २०१३ में उन्हें ‘वाई’ श्रेणी की सुरक्षा दी गई थी। वर्ष २०१४ में इसे बढ़ाकर ‘वाई प्लस’ किया गया, २०१५ में ‘जेड’ श्रेणी की सुरक्षा मिली और वर्ष २०१६ में सुरक्षा का स्तर ‘जेड प्लस’ हो गया।
वकील का कहना था कि इतनी उच्च श्रेणी की सुरक्षा मिलने के बाद उसे अचानक वापस लेने का कारण स्पष्ट किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, १० मई २०२६ को बिना पूर्व सूचना के सुरक्षा घटा दी गई और इसके बाद अभिषेक को केवल ‘एक्स’ श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध कराई गई।
वकील ने अदालत को बताया कि इस श्रेणी के तहत उन्हें केवल दो व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारियों की सुविधा दी गई। इसके विपरीत, ‘जेड प्लस’ सुरक्षा में सुरक्षा प्राप्त व्यक्ति, उसके आवास और कार्यालय की सुरक्षा के लिए व्यापक व्यवस्था हो सकती है। हालांकि, वास्तविक सुरक्षा व्यवस्था खतरे के आकलन और संबंधित अधिकारियों के निर्णय पर निर्भर करती है।
सोनारपुर की घटना का अदालत में उल्लेख
अभिषेक बनर्जी की ओर से अदालत में दावा किया गया कि सुरक्षा घटाए जाने के करीब १९ दिन बाद सोनारपुर में उन पर हमला हुआ। वकील के मुताबिक, इस घटना से पहले सुरक्षा संबंधी जानकारी दिए जाने के बावजूद पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध नहीं कराई गई थी।
याचिकाकर्ता के पक्ष ने आरोप लगाया कि सोनारपुर की घटना के बाद भी सुरक्षा को लेकर उनकी चिंताएं दूर नहीं हुईं। वकील ने कहा कि इसके बाद भी अलग-अलग स्थानों पर उन पर हमले की घटनाएं हुईं।
सुनवाई में कोलकाता हवाई अड्डे पर हुई एक कथित घटना का भी उल्लेख किया गया। अभिषेक के पक्ष की ओर से दावा किया गया कि वहां एक हमलावर के पास रिवॉल्वर होने की बात सामने आई थी। इसके अलावा डायमंड हार्बर और कैमैक स्ट्रीट स्थित उनके कार्यालयों से जुड़े हमलों का भी जिक्र किया गया।
इन घटनाओं को अभिषेक के पक्ष ने सुरक्षा कम किए जाने के बाद उत्पन्न जोखिम से जोड़कर अदालत के सामने रखा। हालांकि, प्रत्येक घटना की परिस्थितियों और उसमें शामिल लोगों की भूमिका को लेकर अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही निकाला जा सकता है। <Cite refs={[“turn545121search2″,”turn545121search6”]}/>
‘चार हमले हुए, जिम्मेदारी कौन लेगा?’
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति कृष्णा राव ने सुरक्षा व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने पूछा कि यदि किसी व्यक्ति पर बार-बार हमले की घटनाएं सामने आ रही हैं, तो उसकी सुरक्षा को लेकर संबंधित अधिकारियों ने क्या कदम उठाए हैं।
अदालत की टिप्पणी का मुख्य आशय यह था कि किसी व्यक्ति पर पत्थर या अन्य वस्तु फेंके जाने की घटना को हल्के में नहीं लिया जा सकता, क्योंकि ऐसी वस्तु शरीर के किसी हिस्से पर लगने से गंभीर चोट भी लग सकती है। न्यायमूर्ति ने राज्य को आवश्यक सावधानी बरतने की जरूरत पर जोर दिया।
अदालत ने यह भी जानना चाहा कि सुरक्षा घटाने के फैसले के पीछे क्या आकलन था और क्या बाद में सामने आई घटनाओं के बाद सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की गई। राज्य सरकार की ओर से मामले में विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने के लिए समय मांगा गया। <Cite refs={[“turn545121search3″,”turn545121search5”]}/>
घर के सामने से पुलिस कियोस्क हटाने का मुद्दा
मामले की सुनवाई में अभिषेक बनर्जी के आवास के सामने से पुलिस कियोस्क हटाए जाने का मुद्दा भी उठाया गया। उनके पक्ष के अनुसार, ‘जेड प्लस’ सुरक्षा वापस लेने के बाद पहले से उपलब्ध अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था में कटौती की गई और बाद में आवास के सामने तैनात पुलिस व्यवस्था में भी बदलाव हुआ।
वकील ने अदालत को बताया कि सुरक्षा कम होने और कथित हमलों की घटनाओं के बाद अभिषेक ने अपनी सुरक्षा बहाल करने की मांग की थी। जब इस संबंध में उनकी मांग पर संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई, तो उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया।
यह मामला अब केवल सुरक्षा श्रेणी में बदलाव तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें यह सवाल भी शामिल है कि सुरक्षा संबंधी फैसले लेते समय खतरे का आकलन किस आधार पर किया गया और बाद में सामने आई घटनाओं के बाद क्या कदम उठाए गए।
राज्य सरकार को रिपोर्ट देने का निर्देश
कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार से सुरक्षा घटाने के फैसले के आधार और उससे जुड़े कदमों पर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। अदालत यह जानना चाहती है कि अभिषेक बनर्जी की सुरक्षा कम करने से पहले क्या आकलन किया गया था और कथित हमलों की जानकारी मिलने के बाद प्रशासन ने क्या कार्रवाई की।
सुरक्षा व्यवस्था का निर्धारण आम तौर पर संबंधित व्यक्ति के सामने मौजूद खतरे और अधिकारियों के आकलन के आधार पर किया जाता है। इसलिए अदालत में पेश होने वाली रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो सकेगा कि राज्य सरकार ने सुरक्षा घटाने के फैसले के समर्थन में क्या कारण दर्ज किए थे।
अब इस मामले की अगली सुनवाई १३ अक्टूबर को होगी। उस दिन राज्य सरकार की रिपोर्ट और अदालत के सवालों पर आगे विचार किए जाने की उम्मीद है। फिलहाल हाईकोर्ट ने सुरक्षा बहाल करने के संबंध में अंतिम फैसला सुनाने के बजाय राज्य से विस्तृत जानकारी मांगी है।
अभिषेक बनर्जी की सुरक्षा का यह मामला आने वाली सुनवाई में किस दिशा में आगे बढ़ता है, इस पर राजनीतिक और कानूनी हलकों की नजर बनी हुई है। अदालत की अगली कार्यवाही में राज्य सरकार के जवाब से सुरक्षा घटाने के फैसले की प्रक्रिया और उसके आधार को लेकर स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है।




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