नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद चुनावी प्रक्रिया और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर राजनीतिक विवाद लगातार गहराता जा रहा है। इसी कड़ी में तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग दोहराई है। वहीं, पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने चुनावी आंकड़ों का हवाला देते हुए दावा किया कि राज्य की करीब 150 विधानसभा सीटों पर मतदाता सूची से हटाए गए नामों और जीत के अंतर के बीच गंभीर सवाल खड़े होते हैं। दोनों नेताओं ने दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत के दौरान चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठाए और कथित अनियमितताओं की जांच तथा संबंधित रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की मांग की।
ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर ममता का फिर हमला
दिल्ली में इंडिया गठबंधन की बैठक में शामिल होने पहुंचीं ममता बनर्जी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग की। उन्होंने कहा कि इसके लिए वर्ष 2029 तक इंतजार करने की जरूरत नहीं है और उससे पहले ही ‘खुशखबरी’ मिल सकती है। उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज हो गई हैं।
ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग की भूमिका निष्पक्ष नहीं रही। उन्होंने एसआईआर प्रक्रिया के जरिए वैध मतदाताओं के नाम हटाए जाने और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित किए जाने का आरोप लगाया। हालांकि, ये आरोप तृणमूल कांग्रेस की ओर से लगाए गए हैं और इनकी स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को ‘वैनिश कुमार’ कहकर संबोधित करते हुए ममता ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची से लोगों के नाम गायब हुए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि वर्ष 2023 के कानून के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को दिए गए कानूनी संरक्षण का दायरा क्या होना चाहिए। उनका कहना था कि इस कानून को पर्याप्त बहुमत के बिना पारित किए जाने को लेकर भी सवाल हैं।
अभिषेक बनर्जी ने 150 सीटों के आंकड़ों का किया जिक्र
अभिषेक बनर्जी ने अपनी पत्रकार वार्ता में एसआईआर के दौरान मतदाता सूची से हटाए गए नामों और विधानसभा चुनाव में उम्मीदवारों की जीत के अंतर की तुलना की। उनका दावा है कि पश्चिम बंगाल की कम से कम 150 विधानसभा सीटों पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या संबंधित सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों की जीत के अंतर से अधिक थी।
अभिषेक के मुताबिक, इन आंकड़ों के आधार पर चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और मतदाता सूची में हुए बदलावों की जांच जरूरी है। उन्होंने आरोप लगाया कि एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटने का चुनाव परिणामों पर असर पड़ सकता है। उन्होंने चुनाव आयोग से संबंधित आंकड़े सार्वजनिक करने और स्वतंत्र जांच की व्यवस्था करने की चुनौती भी दी।
हालांकि, मतदाता सूची से हटाए गए नामों की संख्या और किसी विधानसभा सीट पर जीत के अंतर की तुलना अपने आप में यह साबित नहीं करती कि चुनाव परिणाम प्रभावित हुआ। इसके लिए यह देखना जरूरी होगा कि हटाए गए मतदाता वास्तव में पात्र थे या नहीं, उनके नाम किस प्रक्रिया के तहत हटाए गए और संबंधित चुनाव क्षेत्र में इसका वास्तविक प्रभाव क्या रहा।
फॉर्म-6 के जरिए नए नाम जोड़ने पर भी उठाए सवाल
अभिषेक बनर्जी ने फॉर्म-6 के जरिए मतदाता सूची में नए नाम जोड़े जाने को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि एक तरफ एसआईआर के दौरान कई मतदाताओं के नाम हटाए गए, वहीं दूसरी तरफ नए नाम जोड़ने की प्रक्रिया में भी अनियमितताएं हुईं। तृणमूल कांग्रेस की ओर से इस पूरी प्रक्रिया का विवरण सार्वजनिक करने की मांग की गई है।
फॉर्म-6 का इस्तेमाल पात्र नागरिकों द्वारा मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। इसलिए इस प्रक्रिया से जुड़े आरोपों की जांच में आवेदन, पात्रता, सत्यापन और नाम शामिल किए जाने के रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होंगे। अभिषेक ने कहा कि चुनाव आयोग को इन सभी पहलुओं पर स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए।
100 मतदान केंद्रों की सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक करने की चुनौती
चुनाव में कथित धांधली के आरोपों को लेकर अभिषेक बनर्जी ने 100 मतदान केंद्रों की सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक करने की चुनौती दी। उनका कहना था कि यदि चुनाव प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी रही है, तो संबंधित मतदान केंद्रों की फुटेज और रिकॉर्ड की जांच कराई जानी चाहिए।
उन्होंने मतगणना के दौरान भी अनियमितताओं का आरोप लगाया। तृणमूल नेता के मुताबिक, मतदान और मतगणना से संबंधित रिकॉर्ड सामने आने पर उनकी ओर से उठाए गए सवालों की पड़ताल हो सकती है। इस मांग के बाद चुनाव आयोग के सामने पारदर्शिता और उपलब्ध रिकॉर्ड के इस्तेमाल को लेकर राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है।
भवानीपुर चुनाव और ईवीएम को लेकर ममता के आरोप
ममता बनर्जी ने भवानीपुर विधानसभा चुनाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि वहां मतगणना और मतदान प्रक्रिया के दौरान अनियमितताएं हुईं। उन्होंने ईवीएम हैक किए जाने और वोट लूटे जाने का भी दावा किया। ये आरोप भी उनके राजनीतिक बयान का हिस्सा हैं; इनकी पुष्टि के लिए संबंधित तकनीकी और चुनावी रिकॉर्ड की जांच आवश्यक होगी।
ममता ने कहा कि उनके करीबी नेताओं पर दबाव बनाया जा रहा है और उन्हें विपक्षी खेमे में जाने के लिए मजबूर करने की कोशिश हो रही है। उन्होंने अपने बयान में कहा कि राजनीतिक घटनाक्रम तेजी से बदल रहा है और 2029 तक इंतजार करने की जरूरत नहीं है।
चुनाव आयोग और भाजपा की ओर से अलग पक्ष
चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया को लेकर पहले भी लगाए गए आरोपों को खारिज किया है। आयोग की ओर से कहा गया है कि प्रक्रिया नियमों के तहत संचालित की जा रही है और संबंधित निर्णय आयोग के सदस्यों की सहमति से लिए गए हैं। दूसरी ओर, भाजपा नेताओं ने भी चुनाव आयोग का बचाव करते हुए विपक्ष के आरोपों को राजनीतिक बताया है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने मतदाता सूची में नाम हटने के मुद्दे पर ममता बनर्जी के आरोपों को खारिज किया है।
ऐसे में पूरे विवाद में दोनों पक्षों के दावों और चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण को अलग-अलग समझना महत्वपूर्ण है। मतदाता सूची, मतदान केंद्रों के रिकॉर्ड और मतगणना से जुड़े दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच से ही आरोपों की वास्तविकता स्पष्ट हो सकती है।
इंडिया गठबंधन की बैठक के बाद बढ़ सकती है साझा रणनीति
दिल्ली में हुई इंडिया गठबंधन की बैठक में एसआईआर और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग प्रमुख मुद्दों में शामिल रहे। विपक्षी दल इस मुद्दे पर साझा रणनीति बनाने और चुनाव आयोग के खिलाफ अपना विरोध तेज करने पर विचार कर रहे हैं। ममता बनर्जी ने भी इसे केवल पश्चिम बंगाल का मामला नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और मताधिकार से जुड़ा मुद्दा बताया।
फिलहाल ममता और अभिषेक बनर्जी के बयानों ने चुनाव आयोग को लेकर जारी राजनीतिक बहस को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर ला दिया है। अब निगाहें चुनाव आयोग के अगले स्पष्टीकरण, विपक्ष की आगे की रणनीति और उन आंकड़ों पर रहेंगी, जिन्हें अभिषेक बनर्जी ने सार्वजनिक जांच के लिए महत्वपूर्ण बताया है।




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