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तृणमूल में बगावत! ऋतब्रत बने विपक्ष के नेता, 58 विधायकों का समर्थन

Moutushi · 4 June 2026, 10:59 AM

पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा राजनीतिक भूचाल देखने को मिला है। विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की करारी हार के महज एक महीने के भीतर ही पार्टी में खुली बगावत सामने आ गई है।

तृणमूल से निष्कासित नेता ऋतब्रत बंद्योपाध्याय अब पश्चिम बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता बन गए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि तृणमूल के टिकट पर जीतने वाले दो-तिहाई विधायक उनके समर्थन में खड़े हो गए हैं, जिससे पार्टी के अंदर गहरी दरार साफ दिखाई दे रही है।

बुधवार को 58 विधायकों के समर्थन पत्र के साथ ऋतब्रत बंद्योपाध्याय विधानसभा पहुंचे। विद्रोही विधायकों ने पहले काउंसिल चेंबर में बैठक की और उसके बाद विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बसु से मुलाकात की। सभी तथ्यों और दस्तावेजों की समीक्षा के बाद अध्यक्ष ने ऋतब्रत को विपक्ष का नेता और उनके प्रस्तावित पदाधिकारियों को मान्यता दे दी। इसके साथ ही उन्हें विपक्ष के नेता के लिए निर्धारित कक्ष भी सौंप दिया गया।

🟡 “ममता ही हमारी नेता हैं, लेकिन…”

विपक्ष का नेता बनने के बाद ऋतब्रत बंद्योपाध्याय ने बड़ा बयान देते हुए कहा कि ममता बनर्जी ही उनकी नेता हैं और वे उन्हें सलाहकार की भूमिका निभाने का अनुरोध करेंगे। हालांकि उन्होंने साफ कर दिया कि उनका अभिषेक बनर्जी से कोई संबंध नहीं है।

उन्होंने कहा कि फिलहाल उनके साथ 58 विधायक मौजूद हैं और दो अन्य विधायक राज्य से बाहर हैं। उनकी सहमति मिलने पर यह संख्या 60 तक पहुंच जाएगी, जो स्पष्ट बहुमत को दर्शाता है।

🟡 सरकार के खिलाफ भी, अच्छे कामों का समर्थन भी

ऋतब्रत ने अपने रुख को स्पष्ट करते हुए कहा कि वे विधानसभा में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी सरकार के खिलाफ मुद्दों पर संघर्ष करेंगे, लेकिन सरकार के अच्छे कार्यों का समर्थन करने से भी पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी द्वारा विपक्षी विधायकों को प्रशासनिक बैठक में आमंत्रित करने के लिए धन्यवाद भी दिया।

उनका कहना था, “मैं कोई बॉस नहीं हूं, मैं ‘हम’ में विश्वास करता हूं। सभी निर्णय सामूहिक चर्चा के बाद लिए जाएंगे।”

🟡 कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद?

दरअसल, यह पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में शोभनदेव चट्टोपाध्याय को मान्यता देने वाले पत्र पर फर्जी हस्ताक्षरों का आरोप लगा। आरोप था कि अभिषेक बनर्जी द्वारा भेजे गए प्रस्ताव पत्र में कई विधायकों के हस्ताक्षर असली नहीं थे।

इस मामले में ऋतब्रत और संदीपन साहा ने ही सबसे पहले आवाज उठाई और विधानसभा को इसकी जानकारी दी। इसके बाद हेयर स्ट्रीट थाने में एफआईआर दर्ज की गई और जांच शुरू हुई। सीआईडी भी इस जांच में शामिल हो गई है और अब तक 13 विधायकों से पूछताछ की जा चुकी है।

🟡 पार्टी में बढ़ता असंतोष

इस विवाद के बाद तृणमूल में असंतोष खुलकर सामने आने लगा। सोमवार को ऋतब्रत बंद्योपाध्याय और संदीपन साहा को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया, जिसके बाद कई विधायक खुलकर उनके समर्थन में आ गए।

सूत्रों के मुताबिक, कालीघाट में हुई बैठकों में भी कई नेताओं ने नेतृत्व को लेकर असहमति जताई थी। खासकर फलता के जहांगिर खान को लेकर उठे सवालों ने पार्टी के अंदर खींचतान को और बढ़ा दिया।

🟡 “नई तृणमूल” की चर्चा तेज

अब राजनीतिक गलियारों में यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि असली तृणमूल कौन है। कुछ लोग विद्रोही गुट को ही “नई तृणमूल” कहने लगे हैं। वहीं, चुनाव चिह्न और पार्टी पर अधिकार को लेकर भी बहस तेज हो गई है।

📊 निष्कर्ष

पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह घटनाक्रम एक बड़े बदलाव का संकेत दे रहा है। जिस तरह से तृणमूल के भीतर से ही बड़ी संख्या में विधायक अलग खेमे में चले गए हैं, उससे आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति और भी दिलचस्प होने वाली है।

अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या यह विद्रोह एक नए राजनीतिक समीकरण को जन्म देगा या फिर तृणमूल इसे संभाल पाएगी।

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