मुंबई: टाटा समूह के शीर्ष नेतृत्व को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद सामने आया है। टाटा संस के बोर्ड ने मौजूदा चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन को अगले पांच वर्षों के लिए फिर से चेयरमैन बनाए रखने का फैसला किया है, लेकिन इस फैसले पर टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नॉयल टाटा ने आपत्ति जताई है। नॉयल टाटा ने बोर्ड की बैठक में चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति के खिलाफ मतदान किया। इसके बाद टाटा ट्रस्ट्स ने अपने आधिकारिक बयान में इस प्रस्ताव को ‘कानूनी रूप से अमान्य’ बताया है।
चंद्रशेखरन के फैसले ने बदला पूरा समीकरण
दरअसल, 12 अगस्त 2026 को एन. चंद्रशेखरन ने टाटा संस के बोर्ड को पत्र भेजकर स्पष्ट किया था कि वह अपने मौजूदा कार्यकाल की समाप्ति के बाद चेयरमैन पद के लिए दोबारा अपना नाम पेश नहीं करना चाहते। उनका मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को समाप्त होना है। इस घोषणा के बाद टाटा ट्रस्ट्स ने उनके फैसले को स्वीकार करते हुए नए चेयरमैन की तलाश के लिए चयन प्रक्रिया शुरू करने की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही थी।
लेकिन कुछ ही सप्ताह बाद परिस्थितियां बदल गईं। टाटा संस के बोर्ड ने 17 सितंबर को हुई बैठक में चंद्रशेखरन को अगले पांच वर्षों के लिए फिर से चेयरमैन नियुक्त करने का प्रस्ताव पारित कर दिया। रिपोर्टों के मुताबिक, प्रस्ताव के पक्ष में चार निदेशकों ने मतदान किया, जबकि नॉयल टाटा ने इसके खिलाफ वोट दिया। इसके बावजूद बहुमत के आधार पर प्रस्ताव पारित हो गया।
नॉयल टाटा ने क्यों जताई आपत्ति?
नॉयल टाटा की आपत्ति का मुख्य आधार चंद्रशेखरन की 12 अगस्त की घोषणा और टाटा संस के नियमों को बताया जा रहा है। टाटा ट्रस्ट्स के अनुसार, चंद्रशेखरन ने जब सार्वजनिक रूप से अपने मौजूदा कार्यकाल के बाद दोबारा पद पर बने रहने की इच्छा नहीं होने की बात स्पष्ट कर दी और ट्रस्ट्स ने उस निर्णय को स्वीकार कर लिया, तो बाद में उस फैसले को पलटकर पुनर्नियुक्ति की प्रक्रिया आगे बढ़ाना उचित नहीं है।
टाटा ट्रस्ट्स ने यह भी कहा है कि टाटा संस के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में चेयरमैन की नियुक्ति या पुनर्नियुक्ति के संबंध में ट्रस्ट्स के नामित निदेशकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। ट्रस्ट्स का दावा है कि ऐसे प्रस्ताव के लिए उसके नामित निदेशकों का आवश्यक समर्थन होना चाहिए। नॉयल टाटा ने बैठक में इसी आधार पर पुनर्नियुक्ति प्रस्ताव का विरोध किया।
टाटा ट्रस्ट्स ने यह भी कहा कि नॉयल टाटा ने इस मुद्दे पर पूर्व मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ से प्राप्त कानूनी राय बोर्ड के सामने रखी थी। ट्रस्ट्स के मुताबिक, इस राय को बोर्ड ने ध्यान में नहीं लिया। हालांकि, यह कानूनी स्थिति फिलहाल संबंधित पक्षों के बीच विवाद का विषय है और अंतिम निष्कर्ष सक्षम कानूनी या कॉरपोरेट प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
टाटा संस में 66 प्रतिशत हिस्सेदारी का सवाल
इस पूरे विवाद को समझने के लिए टाटा संस की संरचना भी महत्वपूर्ण है। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। टाटा संस टाटा समूह की प्रमुख होल्डिंग कंपनी है और इसके जरिए समूह की कई बड़ी कंपनियों में नियंत्रणकारी हिस्सेदारी रखी जाती है। इनमें टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील और एयर इंडिया जैसी प्रमुख कंपनियां शामिल हैं।
यही वजह है कि टाटा संस के चेयरमैन पद से जुड़ा कोई भी फैसला केवल एक व्यक्ति की नियुक्ति तक सीमित नहीं माना जाता। इसका असर समूह की भविष्य की रणनीति, निवेश, नेतृत्व व्यवस्था और कॉरपोरेट गवर्नेंस पर पड़ सकता है।
टाटा संस की लिस्टिंग भी बना बड़ा मुद्दा
चंद्रशेखरन और टाटा ट्रस्ट्स के बीच मतभेद का एक अहम मुद्दा टाटा संस की संभावित शेयर बाजार लिस्टिंग भी है। भारतीय रिजर्व बैंक के नियामकीय ढांचे के तहत टाटा संस पर लिस्टिंग से जुड़ी आवश्यकताओं का दबाव बढ़ा है। हाल में आरबीआई ने टाटा संस की गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी से संबंधित पंजीकरण बनाए रखने के प्रयास को स्वीकार नहीं किया, जिससे कंपनी के लिए नियामकीय अनुपालन और संभावित सार्वजनिक लिस्टिंग का मुद्दा और महत्वपूर्ण हो गया है।
17 सितंबर की बोर्ड बैठक में टाटा संस ने आरबीआई के दिशा-निर्देशों के अनुपालन के लिए आवश्यक कदम उठाने और इस विषय पर आरबीआई, टाटा ट्रस्ट्स तथा अन्य संबंधित पक्षों से सलाह-मशविरा करने की दिशा में भी निर्णय लिया। रिपोर्टों के अनुसार, नॉयल टाटा ने इस प्रस्ताव का भी विरोध किया।
शेयर बाजार में भी दिखी हलचल
टाटा संस के बोर्ड के फैसले के बाद टाटा समूह की कुछ सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में तेज गतिविधि देखने को मिली। रिपोर्टों में टाटा केमिकल्स के शेयर में करीब 14 प्रतिशत तक की तेजी और टाटा स्टील में 2 प्रतिशत से अधिक की बढ़त का उल्लेख किया गया है। हालांकि, किसी शेयर में एक दिन की तेजी को केवल टाटा संस के फैसले से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा, क्योंकि बाजार में कई अन्य कारक भी कीमतों को प्रभावित करते हैं।
अब आगे क्या?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि चंद्रशेखरन की पांच साल की पुनर्नियुक्ति आगे किस तरह लागू होती है। एक तरफ टाटा संस का बोर्ड बहुमत के आधार पर उनके साथ आगे बढ़ने का फैसला कर चुका है, वहीं दूसरी तरफ टाटा ट्रस्ट्स ने इस निर्णय की वैधता पर गंभीर सवाल उठाए हैं और कहा है कि नए चेयरमैन के चयन की प्रक्रिया आगे बढ़नी चाहिए।
ऐसे में आने वाले समय में शेयरधारकों की बैठक, कंपनी के आंतरिक नियमों और संभावित कानूनी प्रक्रियाओं की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि टाटा समूह के शीर्ष स्तर पर नेतृत्व को लेकर मतभेद सार्वजनिक हो चुका है और चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति ने समूह के भविष्य की दिशा को लेकर नई बहस छेड़ दी है।




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