कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। विधानसभा चुनाव में करारी हार के 28 दिन बाद जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहली बार सड़क पर उतरीं, तो उनके साथ मंच पर मौजूद चेहरों की संख्या ने ही सियासी बहस को नया मोड़ दे दिया।
धर्मतला के वाई चैनल पर आयोजित धरना कार्यक्रम में ममता बनर्जी ने हाथ में संविधान लेकर भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ लड़ाई जारी रखने का संकल्प लिया, लेकिन इस कार्यक्रम में तृणमूल कांग्रेस के मात्र 8 विधायक और 6 सांसदों की मौजूदगी ने पार्टी के अंदर संभावित टूट की अटकलों को और तेज कर दिया है।
धरना मंच पर शोभनदेब चट्टोपाध्याय, बिमान बंद्योपाध्याय, फिरहाद (बॉबी) हाकिम, मदन मित्रा, अशोक देव, नयना बंद्योपाध्याय, असीमा पात्र और कुणाल घोष जैसे नेता नजर आए। वहीं सांसदों में कल्याण बंद्योपाध्याय, माला राय, डेरेक ओ’ब्रायन, डोला सेन, सामिरुल इस्लाम और नादिमुल हक की उपस्थिति रही।

राजनीतिक हलकों में सबसे ज्यादा चर्चा उन नेताओं की गैरमौजूदगी को लेकर हो रही है, जो आमतौर पर ऐसे कार्यक्रमों में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इससे यह सवाल उठने लगा है कि क्या तृणमूल कांग्रेस के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है?
इसी बीच, पार्टी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बंद्योपाध्याय और संदीपन साहा के नेतृत्व में टूट की खबरों ने आग में घी डालने का काम किया है। हालांकि ऋतब्रत ने भाजपा के उस दावे को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि करीब 50 विधायक उनके संपर्क में हैं।
धरना मंच से ममता बनर्जी ने अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले का जिक्र करते हुए कहा कि हेलमेट नहीं होता तो पत्थर सीधे सिर पर लग सकता था। उन्होंने अस्पताल प्रशासन पर सहयोग न करने का आरोप भी लगाया।
ममता ने यह भी दावा किया कि तृणमूल विधायकों पर पार्टी छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा है और उन्हें घरों से बाहर निकलने तक नहीं दिया जा रहा। उन्होंने ‘बुलडोजर राजनीति’ और ईडी-सीबीआई के जरिए डराने का आरोप लगाते हुए कहा कि भाजपा को हटाने तक उनका संघर्ष जारी रहेगा।
धरना स्थल को लेकर भी उन्होंने पुलिस प्रशासन पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि रानी रासमणि एवेन्यू में अनुमति नहीं दी गई और माइक तक की इजाजत नहीं मिली। हालांकि बाद में उन्होंने यह भी कहा कि पुलिस केवल ऊपर से मिले आदेशों का पालन कर रही है।
वहीं, भाजपा विधायक और मंत्री तापस राय ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि तृणमूल महाराष्ट्र जैसे हालात की ओर बढ़ रही है, जिससे राजनीतिक माहौल और गरमा गया है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या तृणमूल कांग्रेस के भीतर सच में दरार बढ़ रही है, या यह सिर्फ सियासी रणनीति का हिस्सा है? आने वाले दिनों में इस सियासी ड्रामे का अगला अध्याय और भी दिलचस्प हो सकता है।















