कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में वर्ष 2021 के नंदीग्राम चुनाव के दौरान ममता बनर्जी के पैर में लगी चोट का मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। इस बार विवाद का केंद्र मेडिकल रिपोर्ट सार्वजनिक किए जाने और मरीज की निजी चिकित्सकीय जानकारी की गोपनीयता है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की ओर से पुरानी मेडिकल रिपोर्ट दिखाए जाने के बाद ममता बनर्जी के वकील ने संबंधित सरकारी अस्पतालों के अधिकारियों को कानूनी नोटिस भेजा है। इसके जवाब में शुभेंदु अधिकारी ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इस मामले में जरूरत पड़ने पर वह एक्स-रे और एमआरआई रिपोर्ट भी सामने रख सकते हैं। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक विवाद और गहरा गया है।
कानूनी नोटिस के बाद शुभेंदु अधिकारी का पलटवार
नवान्न में आयोजित संवाददाता सम्मेलन के दौरान शुभेंदु अधिकारी से ममता बनर्जी के वकील की ओर से भेजे गए कानूनी नोटिस के बारे में सवाल पूछा गया। इस पर उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी को मामले की ज्यादा छानबीन नहीं करनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा, “अगर एक्स-रे और एमआरआई रिपोर्ट दिखाने लगा, तो घर से बाहर नहीं निकल पाएंगी।”
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि संबंधित दस्तावेज एसएसकेएम अस्पताल में मौजूद नहीं थे। उन्होंने दावा किया कि ममता बनर्जी इस मामले को लेकर गलती कर रही हैं और जरूरत पड़ने पर वह बता देंगे कि दस्तावेज उन्हें कहां से मिले। हालांकि, उनके बयान से दस्तावेजों के वास्तविक स्रोत की पूरी जानकारी सामने नहीं आई है। इस मुद्दे पर अस्पताल प्रशासन की ओर से दस्तावेजों की उपलब्धता और उनके सार्वजनिक होने की परिस्थितियों को स्पष्ट किया जाना महत्वपूर्ण होगा।
मेडिकल रिकॉर्ड सार्वजनिक होने पर कानूनी सवाल
ममता बनर्जी के वकील ने एसएसकेएम अस्पताल के निदेशक, चिकित्सा अधीक्षक और बांगुर इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरोसाइंसेज के संबंधित विभागाध्यक्ष को कानूनी नोटिस भेजा है। नोटिस में पूछा गया है कि वर्ष 2021 में ममता बनर्जी के इलाज से जुड़े दस्तावेज शुभेंदु अधिकारी तक कैसे पहुंचे और फिर सार्वजनिक रूप से कैसे दिखाए गए।
इस मामले में राज्य के स्वास्थ्य विभाग के प्रधान सचिव को भी नोटिस की प्रति भेजे जाने की जानकारी सामने आई है। कानूनी नोटिस में मेडिकल रिकॉर्ड की गोपनीयता, दस्तावेजों के मूल होने और उन्हें सार्वजनिक करने की अनुमति से जुड़े सवाल उठाए गए हैं। इसमें यह भी स्पष्टीकरण मांगा गया है कि क्या संबंधित दस्तावेज किसी न्यायालय के आदेश के तहत सार्वजनिक किए गए थे।
यहां मुख्य प्रश्न केवल रिपोर्ट में लिखी बातों का नहीं, बल्कि उन दस्तावेजों तक पहुंच और उनके इस्तेमाल की प्रक्रिया का भी है। किसी जांच एजेंसी या सरकारी विभाग के पास दस्तावेज होने और उन्हें सार्वजनिक करने की अनुमति होने के बीच अंतर हो सकता है। हालांकि, इस मामले में किसी नियम का उल्लंघन हुआ है या नहीं, इसका निष्कर्ष संबंधित तथ्यों और कानूनी प्रक्रिया की जांच के बाद ही निकाला जा सकता है।
शुभेंदु अधिकारी ने अस्पताल से दस्तावेज मिलने से किया इनकार
शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि संबंधित दस्तावेज एसएसकेएम अस्पताल में नहीं थे और वहां होने भी नहीं चाहिए थे। उन्होंने पुराने मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि ममता बनर्जी ने पहले भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी और मामला अपराध जांच विभाग के पास गया था।
उन्होंने यह भी दावा किया कि नवान्न में उनके ड्रॉअर में कुछ दस्तावेज रह गए थे, जिन्हें ममता बनर्जी अपने साथ नहीं ले जा सकीं। हालांकि, इस बयान से यह स्वतंत्र रूप से प्रमाणित नहीं होता कि सार्वजनिक की गई मेडिकल रिपोर्ट उन्हीं दस्तावेजों में शामिल थी। रिपोर्ट कहां से प्राप्त हुई, किसके पास उसकी प्रति थी और उसे सार्वजनिक करने की अनुमति किस आधार पर दी गई—ये सवाल अब भी महत्वपूर्ण हैं।
क्या था वर्ष 2021 के नंदीग्राम का पूरा मामला?
यह विवाद पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2021 से जुड़ा है। उस समय ममता बनर्जी नंदीग्राम विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रही थीं। 10 मार्च 2021 को चुनाव प्रचार के दौरान बिरुलिया बाजार इलाके में उनके पैर में चोट लगी थी। ममता बनर्जी ने आरोप लगाया था कि मंदिर में प्रणाम करने के दौरान कुछ लोगों ने उनकी गाड़ी के दरवाजे से उन्हें दबा दिया, जिससे उन्हें चोट आई।
घटना के बाद उन्हें कोलकाता के एसएसकेएम अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान वह व्हीलचेयर पर दिखाई दी थीं और चुनाव प्रचार भी जारी रखा था। उस समय चोट की प्रकृति और घटना की परिस्थितियां राजनीतिक बहस का विषय बन गई थीं।
वर्ष 2026 में शुभेंदु अधिकारी ने पुराने मामले से संबंधित एक कथित रेडियोलॉजी रिपोर्ट सार्वजनिक की। उनके अनुसार, 11 मार्च 2021 की रिपोर्ट में पैर में फ्रैक्चर या हड्डी खिसकने का प्रमाण नहीं था। इसी आधार पर उन्होंने चोट को लेकर ममता बनर्जी के पुराने दावों पर सवाल उठाए। लेकिन किसी रिपोर्ट में फ्रैक्चर का प्रमाण नहीं मिलने से अपने आप यह साबित नहीं होता कि व्यक्ति को किसी प्रकार की चोट लगी ही नहीं थी। पूरे चिकित्सकीय रिकॉर्ड और घटना के अन्य प्रमाणों को देखे बिना अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
अब जांच और स्पष्टीकरण पर टिकी निगाहें
इस विवाद में अब दो प्रमुख पहलू सामने हैं। पहला, वर्ष 2021 में ममता बनर्जी को लगी चोट और उस समय किए गए दावों को लेकर शुभेंदु अधिकारी के आरोप। दूसरा, निजी मेडिकल रिकॉर्ड सार्वजनिक होने की परिस्थितियां और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी।
ममता बनर्जी के वकील ने दस्तावेजों के स्रोत और उन्हें सार्वजनिक किए जाने के आधार पर स्पष्टीकरण मांगा है। दूसरी ओर, शुभेंदु अधिकारी ने रिपोर्ट को लेकर अपने दावों पर कायम रहते हुए जरूरत पड़ने पर अन्य दस्तावेज दिखाने की बात कही है। फिलहाल इन बयानों और आरोपों को किसी अंतिम जांच निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग कानूनी नोटिस पर क्या जवाब देते हैं तथा दस्तावेजों के स्रोत को लेकर क्या जानकारी सामने आती है। नंदीग्राम की पुरानी घटना से शुरू हुआ यह विवाद अब मेडिकल गोपनीयता, सार्वजनिक जवाबदेही और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच पहुंच गया है।




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