Saturday, 12 September 2026
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‘जोड़ाफूल’ पर किसका हक? आज चुनाव आयोग के सामने आमने-सामने होंगे तृणमूल के दोनों गुट

Moutushi · 12 September 2026, 10:45 AM

नई दिल्ली/कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके चुनाव चिन्ह ‘जोड़ाफूल’ को लेकर चल रहा विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। शनिवार को दिल्ली में चुनाव आयोग के सामने तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुट अपना-अपना पक्ष रखने की तैयारी में हैं। जानकारी के अनुसार, आयोग की ओर से दोनों पक्षों को अलग-अलग समय दिया जाएगा और दोनों गुट अपने-अपने वकीलों के साथ आयोग के सामने अपनी दलीलें पेश करेंगे।

इस सुनवाई को इसलिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीटों पर आगामी 6 अक्टूबर को उपचुनाव होना है। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 16 सितंबर है। ऐसे में चुनाव आयोग का रुख आने वाले चुनाव की तस्वीर पर सीधा असर डाल सकता है।

नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर बड़ा सवाल

पूरे विवाद के केंद्र में दो बड़े सवाल हैं—पहला, ‘तृणमूल कांग्रेस’ नाम का इस्तेमाल आखिर किस गुट को करने दिया जाएगा और दूसरा, पारंपरिक ‘जोड़ाफूल’ चुनाव चिन्ह किस गुट को मिलेगा।

दोनों गुटों के आयोग के सामने अपना दावा पेश करने के बाद चुनाव आयोग उपलब्ध दस्तावेजों, संगठनात्मक दावों और संबंधित पक्षों की दलीलों पर विचार कर सकता है। हालांकि, अंतिम निर्णय किस दिशा में जाएगा, यह आयोग की सुनवाई और उसके बाद की प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

उपचुनाव की तारीख नजदीक होने के कारण समय का दबाव भी महत्वपूर्ण है। यदि नामांकन की अंतिम तारीख से पहले विवाद पर कोई निर्णय हो जाता है, तो उम्मीदवारों और राजनीतिक संगठनों के लिए स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है। वहीं, यदि अंतिम फैसला तत्काल संभव नहीं होता है, तो आयोग के सामने अंतरिम व्यवस्था का विकल्प भी हो सकता है।

क्या ‘जोड़ाफूल’ चुनाव चिन्ह अस्थायी रूप से फ्रीज होगा?

राजनीतिक हलकों में सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात को लेकर है कि चुनाव आयोग ‘जोड़ाफूल’ चुनाव चिन्ह के साथ क्या व्यवस्था अपनाता है। यदि आयोग को लगता है कि विवाद का अंतिम समाधान तत्काल संभव नहीं है, तो चुनाव चिन्ह को अस्थायी रूप से रोकने यानी फ्रीज करने जैसी व्यवस्था पर भी विचार किया जा सकता है।

ऐसी स्थिति में दोनों गुटों को अलग-अलग अस्थायी नाम और चुनाव चिन्ह आवंटित किए जा सकते हैं। यह व्यवस्था तब तक जारी रह सकती है, जब तक आयोग यह तय नहीं कर देता कि संगठन पर वास्तविक दावा किस गुट का स्वीकार किया जाएगा।

हालांकि, यह केवल संभावित अंतरिम व्यवस्था है। वास्तविक फैसला चुनाव आयोग की सुनवाई और उसके बाद लिए जाने वाले निर्णय पर निर्भर करेगा।

नंदीग्राम और रेजिनगर उपचुनाव ने बढ़ाई अहमियत

तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद ऐसे समय सामने है, जब राज्य में दो विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने जा रहे हैं। नंदीग्राम और रेजिनगर में 6 अक्टूबर को मतदान प्रस्तावित है। कांग्रेस की ओर से उम्मीदवार के नाम की घोषणा पहले ही किए जाने की बात सामने आई है, जबकि भाजपा में भी उम्मीदवार को लेकर चर्चा जारी है।

ऐसे में तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों के लिए चुनाव चिन्ह और पार्टी के नाम का सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। 16 सितंबर नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख होने के कारण चुनाव आयोग के सामने होने वाली सुनवाई पर राजनीतिक दलों के साथ-साथ उम्मीदवारों और मतदाताओं की भी नजर है।

शिवसेना विवाद की मिसाल

तृणमूल कांग्रेस के मौजूदा विवाद को समझने के लिए महाराष्ट्र का शिवसेना मामला एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। वर्ष 2022 में एकनाथ शिंदे गुट और उद्धव ठाकरे गुट के बीच शिवसेना के नाम और ‘तीर-धनुष’ चुनाव चिन्ह को लेकर विवाद चुनाव आयोग तक पहुंचा था।

अंधेरी पूर्व विधानसभा उपचुनाव के दौरान आयोग ने अंतरिम व्यवस्था के तहत शिवसेना का नाम और ‘तीर-धनुष’ चुनाव चिन्ह अस्थायी रूप से फ्रीज कर दिया था। इसके बाद एकनाथ शिंदे गुट को ‘दो तलवार और ढाल’ तथा उद्धव ठाकरे गुट को ‘जलती मशाल’ चुनाव चिन्ह दिया गया था।

बाद में फरवरी 2023 में चुनाव आयोग ने अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए एकनाथ शिंदे गुट को वास्तविक शिवसेना माना और ‘तीर-धनुष’ चुनाव चिन्ह उसके पक्ष में कर दिया। उद्धव ठाकरे गुट को अलग नाम और ‘जलती मशाल’ चुनाव चिन्ह के साथ आगे बढ़ना पड़ा।

एनसीपी मामले में भी बनी थी अंतरिम व्यवस्था

एनसीपी के मामले में भी पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह को लेकर इसी तरह का विवाद चुनाव आयोग तक पहुंचा था। जुलाई 2023 में अजित पवार गुट ने वास्तविक राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी पर दावा किया था। इसके बाद मामला चुनाव आयोग के सामने पहुंचा।

फरवरी 2024 में आयोग ने इस विवाद पर अंतिम फैसला सुनाया। इससे पहले चुनावी परिस्थितियों को देखते हुए शरद पवार गुट के लिए अंतरिम चुनाव चिन्ह की व्यवस्था की गई थी। शरद पवार गुट को ‘तुरही बजाता व्यक्ति’ वाला चुनाव चिन्ह दिया गया था।

इन दोनों मामलों की वजह से तृणमूल कांग्रेस के विवाद में भी अंतरिम व्यवस्था की संभावना को लेकर चर्चा तेज है। हालांकि, हर मामले में चुनाव आयोग परिस्थितियों और उपलब्ध दावों के आधार पर अलग निर्णय ले सकता है।

शनिवार की सुनवाई पर टिकी निगाहें

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि शनिवार को चुनाव आयोग के सामने दोनों गुटों की दलीलों के बाद क्या तस्वीर सामने आती है। क्या किसी एक गुट को तृणमूल कांग्रेस का नाम और ‘जोड़ाफूल’ चुनाव चिन्ह मिल जाएगा? क्या चुनाव चिन्ह को अस्थायी रूप से फ्रीज किया जाएगा? या फिर दोनों गुटों को अंतरिम नाम और अलग-अलग चुनाव चिन्ह दिए जाएंगे?

इन सवालों का जवाब आने वाले समय में चुनाव आयोग की कार्रवाई से स्पष्ट होगा। फिलहाल 6 अक्टूबर के उपचुनाव और 16 सितंबर की नामांकन अंतिम तारीख के बीच चुनाव आयोग का फैसला तृणमूल कांग्रेस के दोनों गुटों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। शनिवार की सुनवाई इसलिए केवल एक संगठनात्मक विवाद नहीं, बल्कि आगामी उपचुनाव की चुनावी तस्वीर के लिहाज से भी अहम पड़ाव बन गई है।

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