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बंगाल

शिक्षकों के तबादले का बिल विधानसभा में पास, शुभेंदु अधिकारी के बयान से सियासी भूचाल

Moutushi · 11 September 2026, 9:57 AM

कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा के विशेष सत्र में उच्च शिक्षा से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक पारित हो गया है। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षकों, अधिकारियों तथा कर्मचारियों के तबादले से संबंधित ‘द वेस्ट बंगाल यूनिवर्सिटीज एंड कॉलेजेज (एडमिनिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) (अमेंडमेंट) बिल, 2026’ को ध्वनिमत के बाद मतदान के जरिए मंजूरी दी गई। मतदान में विधेयक के पक्ष में 171 वोट, जबकि विपक्ष में 15 वोट पड़े। विधेयक के पारित होने के साथ ही राज्य की उच्च शिक्षा व्यवस्था, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और शिक्षकों के स्थानांतरण को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है।

विधेयक पर मतदान से पहले मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने विधानसभा में करीब 33 मिनट तक अपना वक्तव्य दिया। इसके बाद उच्च शिक्षा मंत्री के वक्तव्य के बाद विधेयक को मतदान के लिए रखा गया। सरकार की ओर से इसे प्रशासनिक जरूरत, मानव संसाधन के बेहतर इस्तेमाल और राज्य के नए विश्वविद्यालयों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया गया है।

यादवपुर विश्वविद्यालय को लेकर मुख्यमंत्री का तीखा बयान

अपने भाषण के दौरान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने यादवपुर विश्वविद्यालय का मुद्दा प्रमुखता से उठाया। उन्होंने विश्वविद्यालय में कथित दीवार लेखन और देशविरोधी नारों से जुड़े विवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसी गतिविधियों को किसी भी परिस्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि ऋषि अरविंद द्वारा स्थापित यादवपुर विश्वविद्यालय को उत्कृष्टता का केंद्र बनाने की योजना है। इसके लिए केंद्र सरकार की ओर से 1000 करोड़ रुपये और राज्य सरकार की ओर से 300 करोड़ रुपये दिए जाने की बात कही गई। उन्होंने कहा कि इतने बड़े संस्थान में शिक्षा और शोध का वातावरण बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है।

इसी संदर्भ में उन्होंने कथित तौर पर ‘कश्मीर मांगे आजादी’ और ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे नारों का जिक्र किया और कहा कि यदि विश्वविद्यालय परिसर में इस तरह की गतिविधियां होती हैं तो सरकार इसे बर्दाश्त नहीं करेगी। अपने तीखे अंदाज में मुख्यमंत्री ने कहा, “हम ही आपको टुकड़े कर देंगे।” इस बयान के बाद विधानसभा की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर और तेज होने की संभावना है।

शिक्षकों पर भी कार्रवाई के संकेत

शुभेंदु अधिकारी ने दावा किया कि विश्वविद्यालय के भीतर कुछ शिक्षक छात्रों को कथित तौर पर ऐसी गतिविधियों के लिए उकसाते हैं। उन्होंने ऐसे शिक्षकों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की आवश्यकता जताई। सरकार का कहना है कि शिक्षण संस्थानों में वैचारिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन विश्वविद्यालय परिसर में कानून और अनुशासन से समझौता नहीं किया जा सकता।

मुख्यमंत्री ने वर्ष 1970 के दिसंबर में यादवपुर विश्वविद्यालय परिसर में तत्कालीन कार्यवाहक कुलपति गोपालचंद्र सेन की हत्या का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर पुरानी घटनाओं की जांच के लिए आयोग बनाया जा सकता है। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि उस घटना को आधार बनाकर वर्तमान संशोधन विधेयक लागू नहीं किया जाएगा।

नए विश्वविद्यालयों में भेजे जा सकेंगे अनुभवी शिक्षक

सरकार के अनुसार इस विधेयक का उद्देश्य किसी शिक्षक या कर्मचारी को परेशान करना नहीं है। बल्कि नए और अपेक्षाकृत कमजोर विश्वविद्यालयों को अनुभवी शिक्षकों की विशेषज्ञता उपलब्ध कराना इसका प्रमुख उद्देश्य बताया गया है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पुराने विश्वविद्यालयों में लंबे समय से कार्यरत अनुभवी और विद्वान शिक्षकों के ज्ञान का इस्तेमाल नए विश्वविद्यालयों के विकास में किया जा सकता है। सरकार का मानना है कि इससे राज्य के विभिन्न विश्वविद्यालयों के बीच मानव संसाधन का बेहतर संतुलन बनाया जा सकेगा।

उन्होंने कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र का उदाहरण देते हुए कहा कि अन्य राज्यों में भी विश्वविद्यालयों के बीच शिक्षकों और कर्मचारियों के स्थानांतरण की व्यवस्था मौजूद है। इसलिए पश्चिम बंगाल की प्रस्तावित व्यवस्था को पूरी तरह अभूतपूर्व नहीं माना जाना चाहिए।

राज्य को कानून बनाने का संवैधानिक अधिकार: सरकार

विधेयक को लेकर यह सवाल भी उठाया गया कि विश्वविद्यालयों के अपने कानूनों में बदलाव करने से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी के नियमों के साथ टकराव हो सकता है या नहीं।

इस पर मुख्यमंत्री ने कहा कि शिक्षा संविधान की सातवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाला विषय है और राज्य विधानसभा को इस संबंध में कानून बनाने का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। सरकार का दावा है कि प्रस्तावित संशोधन इसी संवैधानिक अधिकार के तहत किया जा रहा है।

शोधार्थियों के हित प्रभावित नहीं होने का दावा

शिक्षकों के तबादले से शोधार्थियों की पढ़ाई और शोध कार्य प्रभावित होने की आशंका भी उठाई गई। इस पर मुख्यमंत्री ने कहा कि विधेयक में शोधार्थियों के हितों को ध्यान में रखा गया है।

यदि किसी शिक्षक की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति हो जाती है, वह लंबे समय तक बीमार रहता है, किसी दूसरे विश्वविद्यालय में कुलपति नियुक्त हो जाता है या उसकी मृत्यु हो जाती है, तो सरकार शोधार्थी के गाइड में बदलाव कर सकती है। सरकार का कहना है कि इसी तरह की व्यवस्था तबादले की स्थिति में भी शोधार्थियों के हितों की रक्षा करेगी।

क्या बदलेगा नए कानून से?

संशोधन विधेयक के तहत वर्ष 2017 के संबंधित विश्वविद्यालय और कॉलेज कानून में बदलाव करते हुए नई धारा 14-ए जोड़े जाने का प्रस्ताव है। इसके अनुसार प्रशासनिक जरूरत के आधार पर राज्य सरकार से परामर्श करके कुलाधिपति किसी विश्वविद्यालय के कर्मचारी को दूसरे विश्वविद्यालय में स्थानांतरित कर सकते हैं।

तबादले के बाद कर्मचारी को निर्धारित नियमों के अनुसार सेवा संबंधी लाभ मिलेंगे। कर्मचारी चाहे तो अपने मूल विश्वविद्यालय में अपना लियन बनाए रख सकता है या नए विश्वविद्यालय में सेवा जारी रख सकता है। जनहित में तबादला होने और पुराने विश्वविद्यालय में लियन नहीं रखने की स्थिति में वरिष्ठता उसकी संबंधित पद पर प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख के आधार पर तय की जाएगी।

21 विश्वविद्यालयों में पीएफ की समान व्यवस्था

संशोधन विधेयक में राज्य के 21 विश्वविद्यालयों में भविष्य निधि यानी पीएफ से संबंधित व्यवस्था को भी एक समान बनाने का प्रावधान किया गया है। शिक्षकों, अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए गठित भविष्य निधि पर वर्ष 1983 के संबंधित कानून को लागू करने की बात कही गई है।

सरकार का तर्क है कि अलग-अलग विश्वविद्यालयों में पीएफ से जुड़ी व्यवस्थाओं में एकरूपता लाने के लिए समान कानूनी ढांचे की जरूरत है। बजट से संबंधित आवश्यक प्रावधान वित्त विभाग से परामर्श के बाद किए जाने की बात भी विधेयक में कही गई है।

विपक्ष ने जल्दबाजी पर उठाए सवाल

विपक्षी विधायकों ने विधेयक को लेकर सरकार से कई सवाल किए। विपक्ष का सबसे बड़ा सवाल था कि इतने महत्वपूर्ण कानून को इतनी जल्दबाजी में पारित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी। यह आशंका भी जताई गई कि कहीं तबादले की शक्ति का इस्तेमाल राजनीतिक या विशेष उद्देश्य से तो नहीं किया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने अपने भाषण के अंत में कहा, “क्योंकि आप जानते हैं, समझदारों के लिए इशारा ही काफी है।” उनके इस बयान को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा शुरू हो गई है।

शिक्षक संगठनों की मिली-जुली प्रतिक्रिया

विधेयक को लेकर शिक्षक और कर्मचारी संगठनों की राय एक जैसी नहीं है। अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ (उच्च शिक्षा) ने सरकार के कदम का समर्थन किया है। संगठन के राज्य संगठन सचिव विपुल सरकार ने कहा कि स्वायत्तता विकास के लिए उपयोगी है, लेकिन यदि वही स्वायत्तता किसी संस्थान के पतन का कारण बनने लगे तो सरकार की जिम्मेदारी है कि वह संस्थान को बचाए।

भारतीय मजदूर संघ से संबद्ध पश्चिम बंगाल विश्वविद्यालय कर्मचारी संघ के राज्य महासचिव सुशांत मजूमदार ने भी विधेयक का स्वागत किया और कहा कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए सरकार के कदम पर भरोसा किया जाना चाहिए।

हालांकि, कई शिक्षकों ने इसके संभावित प्रभाव को लेकर चिंता जताई है। कलकत्ता विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के अनुसार, कई विश्वविद्यालयों में पहले से ही शिक्षकों और शिक्षाकर्मियों के पद खाली हैं। ऐसे में एक विश्वविद्यालय से शिक्षक हटाकर दूसरे विश्वविद्यालय में भेजने से मौजूदा संस्थान में कर्मचारियों की कमी और बढ़ सकती है।

यादवपुर विश्वविद्यालय के एक शिक्षक ने भी सवाल उठाया कि क्या तबादला शिक्षकों की सहमति से होगा। उनका कहना है कि यदि सहमति के बिना तबादला किया गया तो विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।

अबुटा ने भी जताई आपत्ति

अबुटा ने भी विधेयक के प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं। संगठन का कहना है कि शिक्षक और गैर-शिक्षण कर्मचारी संबंधित विश्वविद्यालयों के विशेष पदों पर नियुक्त होते हैं और उन्हें राज्यव्यापी स्थानांतरण योग्य कैडर का हिस्सा नहीं माना गया है।

संगठन ने सवाल किया कि नियुक्ति के समय जिन शर्तों पर कर्मचारी नौकरी में शामिल हुआ, क्या बाद में उन शर्तों में मौलिक बदलाव किया जा सकता है। अबुटा का तर्क है कि यदि एक विश्वविद्यालय से शिक्षक हटाकर दूसरे विश्वविद्यालय में भेजे जाते हैं तो शिक्षक की कमी दूर होने के बजाय किसी दूसरे संस्थान में नई समस्या पैदा हो सकती है।

फिलहाल विधेयक के विधानसभा से पारित होने के बाद असली परीक्षा इसके लागू होने और तबादलों की प्रक्रिया शुरू होने पर होगी। सरकार इसे ‘एक राज्य, एक शिक्षा नीति’ की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, जबकि विपक्ष और कुछ शिक्षक संगठन इसे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता के लिए संभावित चुनौती मान रहे हैं। अब नजर इस बात पर होगी कि नए कानून के तहत तबादलों की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रहती है और इसका पश्चिम बंगाल के विश्वविद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था पर वास्तविक असर क्या पड़ता है।

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