Friday, 4 September 2026
Advertisement
ब्रेकिंग न्यूज़
कैमक स्ट्रीट के तृणमूल कार्यालय में तड़के हमला! अभिषेक ने सीसीटीवी दिखाकर मांगी गिरफ्तारी नेपाल में हड़पा बाढ़ से हाहाकार! 1,259 मौतें, 5,083 लापता, अब भारत-चीन-अमेरिका से मुआवजे की मांग सरकारी कर्मचारियों के लिए बड़ी खबर! सातवें वेतन आयोग ने खोला ऑनलाइन पोर्टल, 31 अक्टूबर तक भेजें अपनी मांग बारिश थमी तो घटा डैम से पानी का बहाव! मैथन-पंचेत से अब भी 98 हजार क्यूसेक डिस्चार्ज, निचले इलाकों में हाई अलर्ट ईसीएल का बड़ा बुलडोजर अभियान! गिरमिंट में जर्जर 8 सी-टाइप क्वार्टर जमींदोज, सुरक्षा को लेकर लिया गया फैसला बकाया भुगतान को लेकर ठेकेदारों का फूटा गुस्सा! पीएचई यूनियन ने सरकार से लगाई जल्द भुगतान की गुहार कैमक स्ट्रीट के तृणमूल कार्यालय में तड़के हमला! अभिषेक ने सीसीटीवी दिखाकर मांगी गिरफ्तारी नेपाल में हड़पा बाढ़ से हाहाकार! 1,259 मौतें, 5,083 लापता, अब भारत-चीन-अमेरिका से मुआवजे की मांग सरकारी कर्मचारियों के लिए बड़ी खबर! सातवें वेतन आयोग ने खोला ऑनलाइन पोर्टल, 31 अक्टूबर तक भेजें अपनी मांग बारिश थमी तो घटा डैम से पानी का बहाव! मैथन-पंचेत से अब भी 98 हजार क्यूसेक डिस्चार्ज, निचले इलाकों में हाई अलर्ट ईसीएल का बड़ा बुलडोजर अभियान! गिरमिंट में जर्जर 8 सी-टाइप क्वार्टर जमींदोज, सुरक्षा को लेकर लिया गया फैसला बकाया भुगतान को लेकर ठेकेदारों का फूटा गुस्सा! पीएचई यूनियन ने सरकार से लगाई जल्द भुगतान की गुहार
विश्व

नेपाल में हड़पा बाढ़ से हाहाकार! 1,259 मौतें, 5,083 लापता, अब भारत-चीन-अमेरिका से मुआवजे की मांग

Moutushi · 4 September 2026, 10:10 AM

काठमांडू: नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी हड़पा बाढ़ और हिमालयी क्षेत्र में हुए हिमनद तथा चट्टानी मलबे के अचानक खिसकने के बाद हालात बेहद गंभीर बने हुए हैं। आपदा के नौ दिन बाद भी राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है। नेपाल के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, गुरुवार शाम 7 बजे तक कुल 1,259 शव बरामद किए जा चुके हैं, जबकि 5,083 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। बरामद शवों में से केवल 95 की पहचान हो सकी है और उन्हें उनके परिजनों को सौंपा गया है। शेष शवों की पहचान के लिए जांच और डीएनए प्रक्रिया जारी है।

इस प्राकृतिक आपदा ने नेपाल के सामने सिर्फ राहत और पुनर्वास की चुनौती नहीं खड़ी की है, बल्कि अब यह मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहुंचता दिखाई दे रहा है। नेपाल की ओर से जलवायु परिवर्तन और हिमालयी पर्यावरण पर बढ़ते दबाव को लेकर भारत, चीन और अमेरिका जैसे बड़े देशों से जवाबदेही तथा संभावित जलवायु क्षतिपूर्ति की मांग उठाई गई है। इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र के मंच पर उठाने की तैयारी की जा रही है। हालांकि, इस संबंध में अलग-अलग नेपाली अधिकारियों की टिप्पणियों के बीच रुख को लेकर कुछ अंतर भी सामने आए हैं। प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने भारत और चीन से मिली सहायता के लिए सार्वजनिक रूप से आभार भी जताया है।

1,259 शव बरामद, सिर्फ 95 की पहचान

नेपाल में जारी खोज और बचाव अभियान के दौरान अलग-अलग जिलों से बड़ी संख्या में शव बरामद किए गए हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार रसुवा में 127, नुवाकोट में 177, धादिंग में 60, गोरखा में 72, तनहुँ में 38, नवलपरासी पूर्व में 218, नवलपरासी पश्चिम में 212 और चितवन में 355 शव बरामद किए गए हैं।

इसके अलावा कई स्थानों से मानव अवशेष और शवों के हिस्से भी मिले हैं। भारी मलबे, कीचड़ और तेज बहाव के कारण शवों की पहचान करना बचाव दल के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। अधिकारियों के अनुसार, पहचान की प्रक्रिया में डीएनए जांच और उपलब्ध रिकॉर्ड की मदद ली जा रही है।

आपदा प्रभावित क्षेत्रों से 12,038 लोगों को सुरक्षित निकाला गया है। राहत केंद्रों में बड़ी संख्या में प्रभावित लोगों को रखा गया है। हजारों लोग विभिन्न अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में उपचार करा रहे हैं। नेपाल की सेना, पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों के हजारों जवान खोज, बचाव और राहत अभियान में लगे हैं। देशभर में 3,844 राहत केंद्र बनाए गए हैं।

26 अगस्त को टूटा था कहर

इस त्रासदी की शुरुआत 26 अगस्त की सुबह हुई, जब नेपाल-चीन सीमा के निकट रसुवा जिले के ऊपरी हिमालयी क्षेत्र में अचानक बड़े पैमाने पर मलबा और पानी नीचे की ओर आया। इससे ल्हेंदे नदी और उसके बाद भोटेकोशी नदी में अचानक बाढ़ की स्थिति पैदा हुई। नेपाल रेडक्रॉस के अनुसार, बाढ़ की तेज लहर ने तिमुरे, रसुवागढ़ी और स्याफ्रुबेसी सहित कई क्षेत्रों को प्रभावित किया तथा सड़क, पुल, बाजार, पुलिस प्रतिष्ठानों और जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान पहुंचा।

अमेरिकी भूगर्भ सर्वेक्षण के प्रारंभिक आकलन के मुताबिक, यह विनाशकारी मलबा प्रवाह और बाढ़ संभवतः हिमनद से जुड़े तेज ढलान विफल होने के कारण शुरू हुई थी। इसका प्रभाव लगभग 100 किलोमीटर तक नीचे की ओर दिखाई दिया।

चेतावनी प्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

आपदा के बाद नेपाल की पूर्व चेतावनी व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। प्रारंभिक घटनाक्रम के अनुसार, सुबह करीब 8 बजकर 37 मिनट पर क्षेत्र में भूकंपीय गतिविधि दर्ज हुई थी। इसके कुछ समय बाद ऊपरी क्षेत्र में बर्फ और चट्टान से जुड़ी घटना हुई और पानी तथा मलबे का तेज बहाव नीचे की ओर बढ़ा।

नेपाल रेडक्रॉस के अनुसार, भोटेकोशी में अचानक पानी का भारी उछाल लगभग 9 बजकर 15 मिनट के आसपास प्रभावित क्षेत्र में पहुंचा।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आबादी वाले क्षेत्रों को इससे पहले पर्याप्त समय में चेतावनी दी जा सकती थी। यदि चेतावनी प्रणाली और निगरानी तंत्र कुछ मिनट पहले सक्रिय हो जाता, तो संभावित रूप से कई लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का अवसर मिल सकता था। हालांकि, आपदा के वास्तविक कारणों और चेतावनी तंत्र की भूमिका की विस्तृत जांच अभी महत्वपूर्ण है।

भारत समेत कई देश बचाव अभियान में मदद कर रहे

नेपाल की इस भीषण आपदा के बाद भारत, चीन और दक्षिण कोरिया समेत कई देशों से बचाव विशेषज्ञों और उपकरणों की मदद पहुंच रही है। नेपाल के विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत, चीन और दक्षिण कोरिया की सुरंग बचाव टीमें नेपाली सेना के साथ मिलकर काम कर रही हैं। ड्रोन, बचाव उपकरण और अन्य तकनीकी संसाधनों का इस्तेमाल भी किया जा रहा है।

भारत की ओर से भी राहत सामग्री और बचाव संबंधी उपकरण भेजे गए हैं। इस सहायता का उद्देश्य मलबे में फंसे लोगों की तलाश, चिकित्सा सहायता और प्रभावित इलाकों में राहत कार्यों को गति देना है।

अब संयुक्त राष्ट्र में उठेगा जलवायु न्याय का मुद्दा?

नेपाल सरकार और उसके नेताओं की ओर से अब इस आपदा को व्यापक जलवायु संकट से जोड़कर अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाने की तैयारी की जा रही है। नेपाल का तर्क है कि हिमालयी क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभावों के प्रति बेहद संवेदनशील है और इसके लिए जिम्मेदार बड़े उत्सर्जक देशों को प्रभावित विकासशील देशों की मदद करनी चाहिए।

प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के नेतृत्व में नेपाल संयुक्त राष्ट्र महासभा में इस मुद्दे को उठाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा का 81वां सत्र 8 सितंबर 2026 को शुरू होगा और उच्चस्तरीय सामान्य बहस 22 सितंबर से शुरू होगी।

हालांकि भारत, चीन और अमेरिका पर आपदा के लिए सीधे जिम्मेदार होने का आरोप एक गंभीर राजनीतिक और वैज्ञानिक दावा है। प्राकृतिक आपदाओं में स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियां, हिमनदों की अस्थिरता, भूकंपीय गतिविधि और जलवायु परिवर्तन जैसे कई कारक एक साथ भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए इस मामले में वैज्ञानिक जांच और प्रमाण बेहद महत्वपूर्ण होंगे।

तिब्बत में 5 तीव्रता के भूकंप से बढ़ी चिंता

नेपाल की त्रासदी के बीच गुरुवार को तिब्बत क्षेत्र में 5.0 तीव्रता का भूकंप दर्ज किया गया। भारत के राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के अनुसार, भूकंप 3 सितंबर को दोपहर 1 बजकर 46 मिनट 38 सेकंड पर आया और इसकी गहराई करीब 14 किलोमीटर दर्ज की गई। इसका केंद्र जोशीमठ से लगभग 128 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में तिब्बत क्षेत्र में था।

फिलहाल इस भूकंप से बड़े नुकसान या जनहानि की सूचना नहीं है। लेकिन लगातार बदलती हिमालयी परिस्थितियों के कारण विशेषज्ञों की चिंता जरूर बढ़ गई है। ऊंचे पर्वतीय क्षेत्रों में अस्थायी झीलों, बर्फ और मलबे के जमाव तथा कमजोर ढलानों से भविष्य में अचानक बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बना रह सकता है।

आगे भी बड़ी चुनौती

नेपाल के सामने अब सिर्फ लापता लोगों की तलाश नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के पुनर्वास, क्षतिग्रस्त सड़कों और पुलों के पुनर्निर्माण, जलविद्युत परियोजनाओं की बहाली और प्रभावित क्षेत्रों को मुख्य नेटवर्क से दोबारा जोड़ने की चुनौती है।

सबसे बड़ी चिंता उन परिवारों की है जिन्हें अभी तक अपने प्रियजनों की कोई जानकारी नहीं मिली है। काठमांडू में लापता लोगों की तस्वीरें और विवरण जुटाए जा रहे हैं, जबकि कई परिवार अब भी अपने रिश्तेदारों के लौटने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

नेपाल की यह त्रासदी हिमालयी क्षेत्र में आपदा प्रबंधन, समय पर चेतावनी, वैज्ञानिक निगरानी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को लेकर एक बड़ा सवाल छोड़ गई है। आने वाले दिनों में संयुक्त राष्ट्र के मंच पर नेपाल की मांग और इस आपदा के वैज्ञानिक कारणों को लेकर होने वाली चर्चा पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।

 

Advertisement