कोलकाता: पश्चिम बंगाल में नंदीग्राम और रेजिनगर विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी लगातार तेज होती जा रही है। नामांकन दाखिल करने की अंतिम तारीख 16 सितंबर है और उससे महज कुछ दिन पहले कालीघाट तृणमूल ने दोनों सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित कर दिए हैं। हालांकि उम्मीदवारों के नाम सामने आने के साथ ही चुनावी तस्वीर का एक हिस्सा साफ हो गया है, लेकिन तृणमूल के चुनाव चिन्ह और पार्टी फंड पर अधिकार को लेकर चल रहा विवाद अब भी निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुंचा है।
कालीघाट तृणमूल ने नंदीग्राम विधानसभा सीट से संचिता प्रधान दे को उम्मीदवार बनाया है। पेशे से स्कूल शिक्षिका संचिता प्रधान दे पहले पंचायत समिति की सदस्य भी रह चुकी हैं। वह बयाल इलाके की निवासी बताई जाती हैं। नंदीग्राम में कालीघाट गुट के उम्मीदवार की घोषणा इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि 2026 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल ने भाजपा से तृणमूल में आए पवित्र कर को इस सीट से उम्मीदवार बनाया था। अब उपचुनाव में पार्टी ने एक नए चेहरे पर भरोसा जताया है।
दूसरी ओर, मुर्शिदाबाद जिले की रेजिनगर विधानसभा सीट से कालीघाट तृणमूल ने पूर्व विधायक रबिउल आलम चौधरी को मैदान में उतारा है। रबिउल आलम चौधरी का इस क्षेत्र की राजनीति में पुराना अनुभव है। वह वर्ष 2013 में कांग्रेस के टिकट पर पहली बार रेजिनगर से विधायक चुने गए थे। इसके बाद 2016 में भी उन्होंने इसी सीट पर जीत दर्ज की। बाद में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस का दामन थामा और 2021 में घासफूल के चुनाव चिन्ह पर रेजिनगर से तीसरी बार विधायक बने।
चुनाव चिन्ह को लेकर अब भी बड़ा सवाल
उम्मीदवारों की घोषणा के बावजूद तृणमूल के सामने सबसे बड़ी चुनौती चुनाव चिन्ह को लेकर है। तृणमूल के चुनाव चिन्ह और पार्टी फंड पर अधिकार को लेकर पार्टी के दोनों गुट निर्वाचन आयोग के सामने अपना दावा पेश कर चुके हैं। ऐसे में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि घासफूल का चुनाव चिन्ह कालीघाट तृणमूल के पास रहेगा या ऋतब्रत तृणमूल को मिलेगा।
शनिवार को राष्ट्रीय निर्वाचन आयोग ने दोनों गुटों के पांच-पांच प्रतिनिधियों के साथ अलग-अलग बैठक की थी। इसके बाद रविवार को दोनों पक्षों को अलग-अलग पत्र भेजकर अतिरिक्त दस्तावेज जमा करने को कहा गया। दोनों गुटों को 16 सितंबर तक आवश्यक दस्तावेज देने का निर्देश दिया गया है। जरूरत पड़ने पर 17 सितंबर को आयोग एक बार फिर दोनों पक्षों के साथ बैठक या सुनवाई कर सकता है।
कालीघाट तृणमूल को उम्मीद है कि ममता बनर्जी द्वारा स्थापित घासफूल का चुनाव चिन्ह उनके गुट के पास ही रहेगा। इसी बीच सांसद कल्याण बनर्जी ने भी स्पष्ट रूप से कहा है कि उपचुनाव में उनके उम्मीदवार घासफूल के चुनाव चिन्ह पर ही चुनाव लड़ेंगे। हालांकि अंतिम फैसला निर्वाचन आयोग के स्तर पर होना बाकी है।
क्या घासफूल चुनाव चिन्ह हो सकता है फ्रीज?
उपचुनाव बेहद नजदीक होने के कारण चुनाव चिन्ह को लेकर कई तरह की संभावनाओं पर चर्चा शुरू हो गई है। यदि निर्वाचन आयोग उपचुनाव से पहले किसी एक गुट के पक्ष में अंतिम फैसला नहीं करता है, तो अंतरिम व्यवस्था के तहत चुनाव चिन्ह को लेकर निर्देश जारी किए जाने की संभावना बनी हुई है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि तत्काल कोई स्पष्ट निर्णय नहीं होता है तो घासफूल के चुनाव चिन्ह को अस्थायी रूप से ‘फ्रीज’ किया जा सकता है। ऐसी स्थिति में दोनों गुटों को उपचुनाव के लिए अलग-अलग अस्थायी नाम और चुनाव चिन्ह दिए जाने की आवश्यकता पड़ सकती है।
अगर घासफूल का चुनाव चिन्ह ऋतब्रत गुट के पक्ष में जाता है, तो कालीघाट तृणमूल को नंदीग्राम और रेजिनगर में किसी दूसरे चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में उतरना पड़ सकता है। इसके उलट यदि आयोग कालीघाट गुट के पक्ष में फैसला करता है, तो ऋतब्रत गुट को वैकल्पिक चुनाव चिन्ह के साथ चुनाव लड़ना पड़ सकता है। इसलिए उम्मीदवारों की घोषणा के बाद अब सभी की नजर निर्वाचन आयोग के अगले कदम पर टिकी हुई है।
नंदीग्राम में फिर आमने-सामने होगी बड़ी राजनीतिक लड़ाई
2026 के विधानसभा चुनाव में नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों से तत्कालीन विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी ने चुनाव लड़ा था और दोनों सीटों पर जीत दर्ज की थी। बाद में उन्होंने नंदीग्राम सीट छोड़ दी, जिसके कारण यहां उपचुनाव की स्थिति बनी।
नंदीग्राम लंबे समय से पश्चिम बंगाल की राजनीति का बेहद महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। ऐसे में उपचुनाव में यहां होने वाला मुकाबला केवल स्थानीय चुनाव तक सीमित नहीं माना जा रहा है। उम्मीदवारों की घोषणा के बाद राजनीतिक दलों ने क्षेत्र में अपनी गतिविधियां तेज करने की तैयारी शुरू कर दी है।
रेजिनगर में भी मुकाबला दिलचस्प
रेजिनगर की स्थिति भी काफी महत्वपूर्ण है। आम जनता विकास पार्टी के प्रमुख हुमायूं कबीर ने 2026 के विधानसभा चुनाव में नौदा और रेजिनगर दोनों सीटों से चुनाव लड़ा था और दोनों जगह जीत हासिल की थी। बाद में उन्होंने नौदा सीट अपने पास रखते हुए रेजिनगर सीट छोड़ दी। इसी कारण रेजिनगर में भी उपचुनाव कराया जा रहा है।
रेजिनगर से आम जनता विकास पार्टी ने हुमायूं कबीर के पुत्र गोलाम नबी आजाद को उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस ने मोहम्मद अब्दुल्लाही काफ़ी को मैदान में उतारा है, जबकि वाममोर्चा ने सैयद असद अली पर भरोसा जताया है।
कांग्रेस और वाममोर्चा भी मैदान में
कालीघाट तृणमूल के अलावा कांग्रेस और वाममोर्चा ने भी दोनों विधानसभा सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। नंदीग्राम से सीपीआई ने शांति गिरी को उम्मीदवार बनाया है, जबकि कांग्रेस की ओर से मिलन प्रधान चुनाव लड़ेंगे।
वहीं, रेजिनगर में कांग्रेस और वाममोर्चा के उम्मीदवारों के अलावा आम जनता विकास पार्टी का उम्मीदवार भी मुकाबले में है। भाजपा ने अभी तक दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नाम घोषित नहीं किए हैं।
अब 16 सितंबर को नामांकन की अंतिम तारीख और 6 अक्टूबर को मतदान से पहले राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है। 9 अक्टूबर को परिणाम घोषित होने के साथ यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि मतदाताओं ने किस राजनीतिक दावे पर भरोसा जताया। लेकिन उससे पहले सबसे बड़ा सवाल यही बना हुआ है कि तृणमूल के दोनों गुटों के बीच चल रहे चुनाव चिन्ह विवाद पर निर्वाचन आयोग कब और क्या फैसला करता है। उम्मीदवार घोषित होने के बाद अब चुनावी मुकाबले से ज्यादा निगाहें घासफूल के प्रतीक पर टिक गई हैं।




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