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नवमी में पाठे का मांस नहीं छोड़ेंगे शमीक! बागेश्वर बाबा के बयान पर बंगाल में छिड़ी नई बहस

Moutushi · 8 September 2026, 10:36 AM

कोलकाता: पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा शुरू होने से पहले ही मांसाहारी भोजन को लेकर एक नई बहस तेज हो गई है। हावड़ा के लिलुआ में आयोजित ‘हनुमान कथा’ कार्यक्रम में बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की ओर से दुर्गापूजा के दौरान मांसाहारी भोजन से परहेज की अपील के बाद अब राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। इस विवाद में पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद से जुड़े अर्थशास्त्री संजीव सान्याल ने बंगाल की शाक्त परंपरा और खान-पान को लेकर अपनी अलग-अलग लेकिन स्पष्ट प्रतिक्रिया दी है।

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की अपील से शुरू हुआ विवाद

रविवार को हावड़ा के लिलुआ में आयोजित ‘हनुमान कथा’ कार्यक्रम में पहुंचे धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने दुर्गापूजा के दौरान पंडालों के आसपास मांसाहारी भोजन को लेकर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि नवरात्रि और दुर्गापूजा के दौरान देवी की प्रतिमा के आसपास मांसाहारी भोजन की बिक्री या सेवन नहीं होना चाहिए। उन्होंने बंगाल के हिंदुओं से भी इस दिशा में सावधानी बरतने की अपील की।

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के इस बयान के बाद सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक बहस शुरू हो गई। एक ओर इसे धार्मिक आस्था और पूजा की पवित्रता से जोड़कर देखा जा रहा है, तो दूसरी ओर बंगाल की पारंपरिक खान-पान संस्कृति और शाक्त परंपरा का हवाला दिया जा रहा है।

शमीक भट्टाचार्य ने कहा- बंगाल में परंपरा चलती रहेगी

धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बयान पर पश्चिम बंगाल भाजपा अध्यक्ष शमीक भट्टाचार्य ने स्पष्ट असहमति जताई। उन्होंने कहा कि बंगाल के लोगों के खाने-पीने और पहनने को लेकर कोई बाहरी व्यक्ति निर्देश नहीं दे सकता। उनके मुताबिक किसी संत या धार्मिक व्यक्ति को अपनी राय रखने का अधिकार है, लेकिन इससे यह तय नहीं हो सकता कि बंगाल के लोग क्या खाएंगे।

शमीक भट्टाचार्य ने बंगाल की दुर्गापूजा से जुड़ी पारंपरिक भोजन संस्कृति का उल्लेख करते हुए कहा कि अष्टमी के दिन लूची और नवमी के दिन पाठे का मांस खाने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और यह जारी रहेगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत धार्मिक मान्यता को पूरे समाज पर लागू नहीं किया जा सकता।

उनका बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की अपील को लेकर भारतीय जनता पार्टी के भीतर भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। इससे साफ है कि बंगाल की स्थानीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को लेकर पार्टी के नेताओं की अपनी-अपनी व्याख्या है।

संजीव सान्याल ने शाक्त परंपरा का दिया हवाला

इसी विवाद के बीच अर्थशास्त्री और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद से जुड़े संजीव सान्याल ने भी सामाजिक माध्यम पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने शाक्त हिंदू परंपरा में मांस के धार्मिक महत्व का उल्लेख किया। सान्याल के अनुसार प्राचीन अनुष्ठानों में मां दुर्गा और मां काली को मांस अर्पित किए जाने की परंपरा रही है और दुर्गापूजा की नवमी या दशमी के अवसर पर मांसाहारी प्रसाद ग्रहण करने की परंपरा भी कुछ शाक्त परंपराओं में मौजूद है।

सान्याल ने अपनी टिप्पणी में कहा कि शाक्त हिंदू धर्म की परंपरा के केंद्र में मांस का भी स्थान है और इस पवित्र परंपरा में किसी प्रकार का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जा सकता। उनका यह बयान सामने आते ही विवाद ने और व्यापक रूप ले लिया।

बंगाल की धार्मिक परंपरा बनाम बाहरी सलाह का सवाल

इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सांस्कृतिक सवाल भी खड़ा कर दिया है। बंगाल में दुर्गापूजा केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव भी माना जाता है। अलग-अलग परिवारों, क्षेत्रों और पूजा समितियों में पूजा-पद्धति तथा भोग की परंपराएं अलग हो सकती हैं। कहीं पूरी तरह सात्त्विक भोजन का चलन है, तो कुछ शाक्त परंपराओं में मांसाहारी भोग की मान्यता भी देखी जाती है।

यही वजह है कि मांसाहार को लेकर किसी एक नियम को पूरे बंगाल पर लागू करने की कोशिश को लेकर बहस तेज हो गई है। शमीक भट्टाचार्य ने भी इसी स्थानीय परंपरा और व्यक्तिगत पसंद का हवाला देते हुए कहा कि बंगाल में लोग अपनी परंपरा के अनुसार ही भोजन करेंगे।

विश्व हिंदू परिषद की सलाह से भी उठ चुका है विवाद

इससे पहले विश्व हिंदू परिषद की ओर से भी दुर्गापूजा को लेकर कुछ सुझाव सामने आए थे। इनमें पूजा मंडप के भीतर सात्त्विक और शाकाहारी भोग रखने तथा मंडप के अंदर मांसाहारी खाद्य पदार्थों को नहीं लाने की बात कही गई थी। हालांकि मंडप के बाहर मांसाहारी भोजन के स्टॉल को लेकर अलग व्यवस्था की बात सामने आई थी।

इसके बाद अब धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की अपील और शमीक भट्टाचार्य तथा संजीव सान्याल की प्रतिक्रियाओं ने इस मुद्दे को और चर्चा में ला दिया है।

राजनीतिक रंग ले रहा खान-पान का विवाद

दुर्गापूजा से पहले शुरू हुआ यह विवाद अब केवल खान-पान तक सीमित नहीं रह गया है। इसमें धार्मिक परंपरा, बंगाली सांस्कृतिक पहचान, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और राजनीतिक बयानबाजी जैसे कई मुद्दे जुड़ गए हैं। एक तरफ धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री पूजा के दौरान मांसाहारी भोजन से दूरी की अपील कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ शमीक भट्टाचार्य बंगाल की पारंपरिक भोजन संस्कृति के पक्ष में खड़े दिखाई दे रहे हैं।

वहीं संजीव सान्याल ने इस बहस को शाक्त परंपरा के ऐतिहासिक संदर्भ से जोड़ते हुए अपनी आपत्ति दर्ज कराई है। ऐसे में दुर्गापूजा के पहले यह विवाद आने वाले दिनों में और गरमाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि बंगाल की सदियों पुरानी विविध धार्मिक परंपराओं के बीच भोजन को लेकर यह बहस किस दिशा में जाती है और क्या आने वाले दिनों में राजनीतिक दल या पूजा समितियां इस पर कोई स्पष्ट रुख अपनाती हैं।

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