Monday, 26 October 2026
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आसनसोल-दुर्गापुर

आसनसोल के गराई मेंशन में भव्य राजलक्ष्मी पूजा, माता को चढ़े 56 भोग और 108 तरह की मिठाइयां

Moutushi · 26 October 2026, 5:40 PM

आसनसोल, बिकाश चंद्र, सिटी टुडे न्यूज़ : पश्चिम बर्धमान जिले के आसनसोल में एसबी गराई रोड स्थित प्रसिद्ध गराई मेंशन में कोजागरी लक्ष्मी पूजा पारंपरिक रीति-रिवाजों और भव्यता के साथ संपन्न हुई। गराई परिवार में देवी लक्ष्मी की आराधना ‘राजलक्ष्मी’ के रूप में की जाती है। इस वर्ष भी पूजा के अवसर पर माता को 56 प्रकार के भोग और 108 तरह की मिठाइयां अर्पित की गईं। वहीं, सोमवार को आयोजित अन्नकूट महोत्सव में हजारों श्रद्धालुओं ने भोग-प्रसाद ग्रहण किया। वर्ष 1975 में शुरू हुई इस पूजा की परंपरा आज भी परिवार की अगली पीढ़ियां पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ निभा रही हैं।

दो दिनों तक चला पूजा और अन्नकूट का आयोजन

गराई परिवार में राजलक्ष्मी पूजा का आयोजन दो दिनों तक किया गया। रविवार रात पंचांग के अनुसार निर्धारित समय पर श्री श्री राजलक्ष्मी माता की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। धार्मिक अनुष्ठानों के बाद आरती और पुष्पांजलि का आयोजन हुआ। इस दौरान परिवार के सदस्यों ने परंपरागत तरीके से माता की आराधना की।

पूजा के दूसरे दिन सोमवार दोपहर अन्नकूट महोत्सव आयोजित किया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं के बीच भोग-प्रसाद वितरित किया गया। बड़ी संख्या में लोग गराई मेंशन पहुंचे और माता के दर्शन करने के साथ प्रसाद ग्रहण किया। अन्नकूट के आयोजन ने पूजा को धार्मिक अनुष्ठान के साथ सामुदायिक सहभागिता का अवसर भी प्रदान किया।

1975 में स्वर्गीय षष्ठी नारायण गराई ने की थी शुरुआत

गराई परिवार की राजलक्ष्मी पूजा का इतिहास लगभग पांच दशक पुराना है। वर्ष 1975 में स्वर्गीय षष्ठी नारायण गराई ने इस पूजा की शुरुआत की थी। उनके द्वारा शुरू की गई यह धार्मिक परंपरा समय के साथ परिवार की पहचान बन गई। उनके निधन के बाद भी उनके बेटे, पोते और परिवार के अन्य सदस्य इस आयोजन को लगातार आगे बढ़ाते रहे हैं।

आसनसोल के एसबी गराई रोड पर स्थित गराई मेंशन इस पारिवारिक पूजा का प्रमुख केंद्र है। सड़क का नाम भी गराई परिवार से जुड़ा हुआ है। वर्षों से यहां आयोजित होने वाली राजलक्ष्मी पूजा ने अपनी विशिष्ट परंपराओं के कारण स्थानीय लोगों के बीच अलग पहचान बनाई है।

परिवार के लिए यह आयोजन केवल देवी की आराधना तक सीमित नहीं है, बल्कि पूर्वजों की विरासत को संजोने और नई पीढ़ी तक पारिवारिक परंपराओं को पहुंचाने का माध्यम भी है। समय के साथ परिवार की पीढ़ियां बदलीं, लेकिन पूजा के प्रति श्रद्धा और आयोजन की परंपरा कायम रही।

56 भोग और 108 प्रकार की मिठाइयां हैं खास आकर्षण

गराई परिवार की राजलक्ष्मी पूजा में माता को अर्पित किया जाने वाला भोग विशेष महत्व रखता है। परिवार की तीसरी पीढ़ी के सदस्य और षष्ठी नारायण गराई के पुत्र काशीनाथ गराई, सोमनाथ गराई तथा केदारनाथ गराई ने बताया कि पूजा में आज भी पारंपरिक नियमों और रीति-रिवाजों का पालन किया जाता है।

उनके अनुसार, माता को एक मन चावल का भोग अर्पित किया जाता है। इसके साथ 56 प्रकार के भोग और 108 तरह की मिठाइयां चढ़ाने की परंपरा भी वर्षों से चली आ रही है। भोग की यह विशेष व्यवस्था पूजा के प्रमुख आकर्षणों में शामिल है।

धार्मिक परंपराओं में देवी-देवताओं को विभिन्न प्रकार के पकवान और मिठाइयां अर्पित करना भक्ति और श्रद्धा की अभिव्यक्ति माना जाता है। गराई परिवार में इन परंपराओं को विशेष सावधानी के साथ निभाया जाता है। पूजा के दौरान तैयार किए जाने वाले भोग और मिठाइयों की विविधता आयोजन को विशिष्ट स्वरूप प्रदान करती है।

एक दिन से दो दिनों तक होने लगा आयोजन

परिवार के सदस्यों के अनुसार, वर्ष 1975 में पूजा की शुरुआत के बाद शुरुआती वर्षों में इसका आयोजन सामान्यतः एक दिन तक सीमित रहता था। बाद में इसे दो दिनों तक आयोजित करने की परंपरा शुरू हुई। इससे पूजा और अन्नकूट महोत्सव के माध्यम से अधिक लोगों को शामिल होने का अवसर मिलने लगा।

दो दिनों के आयोजन में पहले दिन मुख्य पूजा, आरती और पुष्पांजलि जैसे धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं, जबकि दूसरे दिन अन्नकूट महोत्सव के दौरान श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरित किया जाता है। इस व्यवस्था से पारिवारिक पूजा में स्थानीय लोगों की भागीदारी भी बढ़ी है।

1981 में एक बार बाधित हुई थी परंपरा

गराई परिवार के सदस्य सोमनाथ गराई ने बताया कि वर्ष 1975 में पूजा शुरू होने के बाद केवल एक बार, वर्ष 1981 में, परिवार के सदस्य पूजा में शामिल नहीं हो पाए थे। उस वर्ष उनकी मां के निधन के कारण पूजा की परंपरा प्रभावित हुई थी। इसके अतिरिक्त परिवार ने इस आयोजन को निरंतर जारी रखने का प्रयास किया है।

यह प्रसंग परिवार के लिए पूजा के इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके बाद परिवार के सदस्यों ने राजलक्ष्मी पूजा की परंपरा को आगे बढ़ाया और आज भी सभी मिलकर इसका आयोजन करते हैं।

आसनसोल और आसपास के क्षेत्रों से पहुंचते हैं श्रद्धालु

गराई मेंशन में आयोजित राजलक्ष्मी पूजा में आसनसोल शहर के साथ-साथ आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। माता के दर्शन, पारंपरिक पूजा और अन्नकूट के प्रसाद में शामिल होने के लिए लोगों का आना इस आयोजन की लोकप्रियता को दर्शाता है।

आसनसोल जैसे औद्योगिक शहर में इस तरह की पुरानी पारिवारिक पूजाएं धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखती हैं। गराई परिवार की राजलक्ष्मी पूजा इसका एक उदाहरण है, जहां लगभग पांच दशक से चली आ रही परंपरा आज भी परिवार के सदस्यों और श्रद्धालुओं को एक साथ जोड़ रही है।

इस वर्ष भी 56 भोग, 108 प्रकार की मिठाइयों, विधि-विधान से पूजा और अन्नकूट महोत्सव के साथ राजलक्ष्मी पूजा संपन्न हुई। स्वर्गीय षष्ठी नारायण गराई द्वारा वर्ष 1975 में शुरू की गई यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ रही है और आसनसोल की धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बनी हुई है।

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