नई दिल्ली, बिकाश चंद्र, सिटी टुडे न्यूज़: मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर जारी विवाद के बीच भारतीय निर्वाचन आयोग ने फॉर्म 6 को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष स्पष्ट किया है। आयोग ने हलफनामा दाखिल कर कहा है कि नए मतदाताओं का नाम मतदाता सूची में शामिल कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 में उसने कोई संशोधन नहीं किया है। एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मांगी गई अतिरिक्त जानकारी के लिए अलग घोषणा-पत्र का इस्तेमाल किया गया था। हालांकि, आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि ऑनलाइन पोर्टल पर फॉर्म और घोषणा-पत्र को जिस तरह दिखाया गया, उससे ऐसा लग सकता था कि फॉर्म 6 में बदलाव कर दिया गया है।
इस सफाई के बाद फॉर्म 6 और एसआईआर को लेकर चल रही बहस फिर चर्चा में आ गई है। सवाल केवल फॉर्म में बदलाव का नहीं, बल्कि मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया, नियमों के पालन और निर्वाचन आयोग के फैसले लेने के तरीके को लेकर भी उठ रहे हैं।
फॉर्म 6 को लेकर चुनाव आयोग ने हलफनामे में क्या कहा?
आयोग ने 26 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा कि फॉर्म 6 में संशोधन किए जाने का आरोप सही नहीं है। आयोग के अनुसार, एसआईआर के दौरान आवेदकों से जो अतिरिक्त जानकारी मांगी गई, उसके लिए एक अलग घोषणा-पत्र तैयार किया गया था। यह घोषणा-पत्र वैधानिक फॉर्म 6 का हिस्सा नहीं है।
फॉर्म 6 का इस्तेमाल उन पात्र लोगों द्वारा किया जाता है, जो पहली बार मतदाता के रूप में पंजीकरण कराना चाहते हैं या मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन करते हैं। आयोग ने स्पष्ट किया कि इस फॉर्म का निर्धारित प्रारूप निर्वाचन पंजीकरण नियम, 1960 के अंतर्गत आता है और इसमें संशोधन करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है।
ऑनलाइन पोर्टल पर कैसे पैदा हुआ भ्रम?
विवाद का एक प्रमुख कारण ऑनलाइन आवेदन प्रणाली में फॉर्म 6 और अतिरिक्त घोषणा-पत्र को प्रदर्शित करने का तरीका था। आयोग ने हलफनामे में स्वीकार किया कि दोनों दस्तावेजों को एक साथ दिखाए जाने के कारण यह धारणा बन सकती थी कि फॉर्म 6 में ही संशोधन कर दिया गया है।
आयोग के मुताबिक, ऑनलाइन आवेदन की प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए दोनों दस्तावेजों को इस तरह जोड़ा गया था, ताकि आवेदक एक ही बार ओटीपी और इलेक्ट्रॉनिक हस्ताक्षर के माध्यम से प्रक्रिया पूरी कर सकें। इससे अलग-अलग दस्तावेजों के लिए बार-बार प्रमाणीकरण की जरूरत नहीं पड़ती।
हालांकि, इस व्यवस्था से भ्रम पैदा होने की आशंका सामने आने के बाद आयोग ने 21 अक्टूबर 2026 से ऑनलाइन प्रणाली में फॉर्म 6 और एसआईआर घोषणा-पत्र को अलग-अलग प्रदर्शित करने का फैसला किया। आयोग ने कहा कि इससे ऑनलाइन प्रक्रिया भौतिक आवेदन की व्यवस्था के अनुरूप हो गई है।
अतिरिक्त घोषणा-पत्र में क्या जानकारी मांगी गई थी?
एसआईआर के दौरान जो अलग घोषणा-पत्र इस्तेमाल किया गया, उसका उद्देश्य आवेदक की जानकारी को पहले की मतदाता सूचियों से जोड़ने में मदद करना था। इसके तहत आवेदक को अपने या अपने माता-पिता अथवा दादा-दादी के नाम का विवरण देने का विकल्प दिया गया, ताकि पुराने मतदाता रिकॉर्ड से उनका संबंध स्थापित किया जा सके।
आयोग का कहना है कि यदि आवेदक की जानकारी पुराने मतदाता रिकॉर्ड से जुड़ जाती है, तो निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार उसे दावे और आपत्तियों के चरण में अतिरिक्त सहायक दस्तावेज जमा करने की जरूरत से राहत मिल सकती है। वहीं, यदि पुरानी सूची से जानकारी का मिलान नहीं हो पाता या आवश्यक विवरण उपलब्ध नहीं होता, तो निर्धारित नियमों के अनुसार संबंधित दस्तावेज मांगे जा सकते हैं।
इस व्यवस्था पर आलोचकों ने सवाल उठाए थे। उनका तर्क था कि पुराने मतदाता रिकॉर्ड से संबंध साबित करने की अतिरिक्त शर्त उन नए मतदाताओं के लिए मुश्किल पैदा कर सकती है, जिनके परिवार का नाम पुरानी सूचियों में उपलब्ध नहीं है। आयोग ने हालांकि इसे फॉर्म 6 में संशोधन नहीं, बल्कि एसआईआर से जुड़ी अलग प्रक्रिया बताया है।
सुप्रीम कोर्ट ने फॉर्म 6 पर क्या कहा था?
फॉर्म 6 का विवाद तब अधिक गंभीर हो गया, जब सुप्रीम कोर्ट में एसआईआर से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि अदालत ने संशोधित फॉर्म 6 को मंजूरी नहीं दी थी। इसके बाद यह सवाल उठा कि यदि अदालत ने ऐसे किसी बदलाव को मंजूरी नहीं दी, तो उसके नाम का उल्लेख क्यों किया गया।
बाद की सुनवाई में अदालत की टिप्पणी का संदर्भ स्पष्ट किया गया। अदालत ने न तो किसी नए फॉर्म 6 को मंजूरी दी थी और न ही उसे खारिज किया था। उसका आशय यह था कि उस समय जिस संशोधित फॉर्म की चर्चा हो रही थी, वह अदालत के समक्ष मंजूरी के लिए प्रस्तुत नहीं किया गया था। इसलिए अदालत ने उसकी समीक्षा भी नहीं की थी।
इस घटनाक्रम ने निर्वाचन आयोग की ओर से पहले दिए गए स्पष्टीकरण और अदालत में रखे गए पक्ष के बीच अंतर को लेकर सवाल पैदा किए। अब आयोग ने हलफनामे में दस्तावेजों की स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि अतिरिक्त घोषणा-पत्र को फॉर्म 6 में संशोधन नहीं माना जाना चाहिए।
क्या चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद का भी मामला है?
फॉर्म 6 का विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब एसआईआर से जुड़े निर्णयों और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं। एक समाचार रिपोर्ट में दावा किया गया था कि निर्वाचन आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं को लेकर अन्य चुनाव आयुक्तों ने आपत्तियां दर्ज की थीं।
आयोग ने अपने हलफनामे में इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि एसआईआर से संबंधित 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 के आदेश आयोग के तीनों सदस्यों की सर्वसम्मत मंजूरी से जारी किए गए थे। आयोग ने यह भी कहा कि किसी फाइल पर किसी आयुक्त की टिप्पणी, सुझाव या सवाल अपने आप में आयोग का अंतिम निर्णय नहीं होता।
इसलिए, इस मामले में आयोग का पक्ष और याचिकाकर्ताओं के आरोप अलग-अलग हैं। हलफनामे में दी गई सफाई को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए; संबंधित मुद्दों पर अदालत की आगे की कार्यवाही महत्वपूर्ण होगी।
नए मतदाताओं के लिए क्या है इसका मतलब?
फिलहाल आयोग की सफाई का मुख्य संदेश यह है कि फॉर्म 6 और एसआईआर घोषणा-पत्र को अलग-अलग दस्तावेज माना जाना चाहिए। नए मतदाताओं को आवेदन करते समय संबंधित निर्देशों को ध्यान से पढ़ना चाहिए और मांगी गई जानकारी सही तरीके से भरनी चाहिए।
यदि पुराने मतदाता रिकॉर्ड से जुड़ी जानकारी उपलब्ध है, तो उसका सही विवरण देना उपयोगी हो सकता है। यदि जानकारी उपलब्ध नहीं है, तो आवेदक को लागू निर्देशों के अनुसार आवश्यक दस्तावेजों और प्रक्रिया के बारे में जानकारी लेनी चाहिए। किसी भी भ्रम की स्थिति में निर्वाचन आयोग के आधिकारिक पोर्टल या संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी से पुष्टि करना बेहतर होगा।
फॉर्म 6 विवाद ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया स्पष्ट, पारदर्शी और आसानी से समझ में आने वाली होनी चाहिए। आयोग ने दस्तावेजों को अलग प्रदर्शित करने का कदम उठाकर ऑनलाइन भ्रम दूर करने की बात कही है। अब आगे की न्यायिक कार्यवाही से यह स्पष्ट होगा कि एसआईआर से जुड़ी अन्य आपत्तियों पर क्या रुख सामने आता है।




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