Sunday, 18 October 2026
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आसनसोल-दुर्गापुर

आसनसोल में कल्याणपुर की आदि दुर्गापूजा का 46वां वर्ष, स्वामीनारायण मंदिर की तर्ज पर बना भव्य पंडाल

Moutushi · 17 October 2026, 5:55 PM

आसनसोल: पश्चिम बंगाल के औद्योगिक शहर आसनसोल में दुर्गापूजा को लेकर उत्सव का माहौल है। शहर के कल्याणपुर इलाके में आदि दुर्गापूजा कमेटी इस वर्ष अपने आयोजन के 46वें वर्ष में प्रवेश कर गई है। चार दशक से अधिक पुरानी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कमेटी ने इस बार पूजा मंडप को एक विशेष धार्मिक और स्थापत्य शैली में सजाने की पहल की है। इस वर्ष पूजा की मुख्य थीम कोलकाता के प्रसिद्ध स्वामीनारायण मंदिर पर आधारित है। इसी अवधारणा के अनुरूप मंडप को मंदिर की तर्ज पर तैयार किया गया है, जो दुर्गापूजा के दौरान श्रद्धालुओं और कला प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन सकता है।

इस बार की सजावट में केवल मंदिर जैसी संरचना को ही महत्व नहीं दिया गया है, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं को भी कलात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया है। मंडप की बाहरी दीवारों पर लगाए गए मॉडलों के माध्यम से श्रीकृष्ण की अलग-अलग लीलाओं को दर्शाने का प्रयास किया गया है। मंदिर की स्थापत्य शैली, धार्मिक प्रसंगों और पारंपरिक मां दुर्गा की प्रतिमा का यह संयोजन इस वर्ष की पूजा को एक अलग पहचान देता है।

स्वामीनारायण मंदिर की तर्ज पर तैयार हुआ मंडप

कल्याणपुर की आदि दुर्गापूजा कमेटी ने इस वर्ष स्वामीनारायण मंदिर को अपनी थीम का आधार बनाया है। मंदिर की शैली से प्रेरित मंडप को धार्मिक वातावरण और कलात्मक प्रस्तुति के साथ सजाया गया है। दुर्गापूजा के दौरान पंडाल निर्माण बंगाल की उत्सव परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। हर वर्ष पूजा समितियां अलग-अलग विषयों को चुनकर अपनी रचनात्मकता का प्रदर्शन करती हैं। कहीं ऐतिहासिक इमारतों की झलक दिखाई जाती है, तो कहीं धार्मिक स्थलों, लोककला और पौराणिक कथाओं को सजावट का आधार बनाया जाता है।

इसी परंपरा के तहत आदि दुर्गापूजा कमेटी ने इस बार मंदिर आधारित विषय को चुना है। मंडप की संरचना को स्वामीनारायण मंदिर की तर्ज पर प्रस्तुत करने का उद्देश्य श्रद्धालुओं को एक अलग दृश्य अनुभव देना है। धार्मिक स्थापत्य से प्रेरित ऐसे मंडपों में सजावट के साथ संरचना की बनावट और उसके समग्र स्वरूप पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है।

इस वर्ष की थीम में मंदिर की झलक को दुर्गापूजा के पारंपरिक वातावरण के साथ जोड़ने की कोशिश की गई है। इससे पूजा मंडप केवल मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करने का स्थान नहीं, बल्कि धार्मिक कला और रचनात्मक कल्पना की प्रस्तुति का माध्यम भी बनता है।

बाहरी दीवारों पर दिखाई देंगी श्रीकृष्ण की लीलाएं

इस पूजा मंडप की एक प्रमुख विशेषता भगवान श्रीकृष्ण की विभिन्न लीलाओं को दर्शाने वाले मॉडल हैं। मंडप की बाहरी दीवारों पर इन मॉडलों को शामिल किया गया है, ताकि श्रद्धालु सजावट के साथ श्रीकृष्ण से जुड़े धार्मिक प्रसंगों को भी देख सकें।

भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएं भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में विशेष स्थान रखती हैं। उनके जीवन से जुड़े प्रसंगों को मंदिरों, चित्रों, मूर्तियों और धार्मिक आयोजनों में अलग-अलग कलात्मक रूपों में प्रस्तुत किया जाता रहा है। पूजा मंडप की सजावट में ऐसे प्रसंगों को शामिल करने से धार्मिक कथाओं और कला के बीच संबंध स्थापित होता है।

आदि दुर्गापूजा कमेटी के इस प्रयास में मंडप की बाहरी सजावट को भी महत्वपूर्ण स्थान मिला है। श्रीकृष्ण की लीलाओं पर आधारित मॉडल लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं और पूजा देखने आने वाले श्रद्धालुओं को मंडप के विभिन्न हिस्सों को करीब से देखने का अवसर दे सकते हैं।

दुर्गापूजा के समय पंडाल देखने आने वाले लोग अक्सर प्रतिमा के साथ-साथ उसकी सजावट, कलाकृतियों और विषय की प्रस्तुति को भी देखते हैं। इस लिहाज से श्रीकृष्ण की लीलाओं को दर्शाने वाले मॉडल इस वर्ष के आयोजन की खास पहचान बन सकते हैं।

पारंपरिक शैली में मां दुर्गा की प्रतिमा

मंडप की भव्य सजावट के बीच मां दुर्गा की प्रतिमा को पारंपरिक यानी सबेकी शैली में तैयार किया गया है। इस तरह मंदिर की तर्ज पर बने पंडाल के साथ मां दुर्गा की पारंपरिक प्रतिमा का संयोजन किया गया है।

बंगाल में दुर्गापूजा की परंपरा में प्रतिमा का स्वरूप विशेष महत्व रखता है। आधुनिक विषयों पर आधारित मंडपों के बीच पारंपरिक प्रतिमा श्रद्धालुओं को पूजा के मूल धार्मिक और सांस्कृतिक भाव से जोड़ती है। सबेकी शैली अपनी पारंपरिक प्रस्तुति के कारण अलग पहचान रखती है। इसमें प्रतिमा के पारंपरिक स्वरूप को महत्व दिया जाता है।

आदि दुर्गापूजा कमेटी ने इस वर्ष मंडप की थीम और प्रतिमा की शैली के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है। एक ओर स्वामीनारायण मंदिर से प्रेरित भव्य सजावट है, तो दूसरी ओर पारंपरिक रूप में मां दुर्गा की प्रतिमा। इस संयोजन से आयोजन में आधुनिक पंडाल निर्माण और बंगाल की पुरानी पूजा परंपरा दोनों की झलक दिखाई देती है।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ सामाजिक पहल

आदि दुर्गापूजा कमेटी की ओर से दुर्गापूजा के अवसर पर प्रतिदिन सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ सामाजिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जा रहा है। इससे पूजा का दायरा केवल धार्मिक अनुष्ठानों और मंडप दर्शन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लोगों को सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेने का अवसर भी मिलता है।

दुर्गापूजा बंगाल में सामुदायिक सहभागिता का एक बड़ा अवसर है। इस दौरान विभिन्न आयु वर्ग के लोग पूजा, सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और सामाजिक गतिविधियों के माध्यम से एक-दूसरे से जुड़ते हैं। सांस्कृतिक कार्यक्रम स्थानीय प्रतिभाओं को अपनी कला प्रस्तुत करने का अवसर भी दे सकते हैं। वहीं सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से समुदाय से जुड़े विषयों को महत्व दिया जा सकता है।

हालांकि, कमेटी की ओर से आयोजित कार्यक्रमों के नाम, समय-सारणी और सामाजिक गतिविधियों के विस्तृत विवरण की जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन प्रतिदिन कार्यक्रम आयोजित करने की पहल उत्सव को अधिक सहभागितापूर्ण बनाने का प्रयास है।

46 वर्षों की परंपरा में नई प्रस्तुति

आदि दुर्गापूजा कमेटी के लिए इस वर्ष का आयोजन इसलिए भी खास है, क्योंकि पूजा अपने 46वें वर्ष में पहुंच गई है। इतने लंबे समय तक किसी स्थानीय पूजा आयोजन को जारी रखना समुदाय की भागीदारी और परंपरा के महत्व को दर्शाता है। हर वर्ष नई थीम के माध्यम से पूजा को अलग स्वरूप देने की कोशिश इस परंपरा को आगे बढ़ाने का एक तरीका है।

इस बार स्वामीनारायण मंदिर की तर्ज पर मंडप, श्रीकृष्ण की लीलाओं को दर्शाने वाले मॉडल और पारंपरिक शैली में मां दुर्गा की प्रतिमा आयोजन के प्रमुख आकर्षण हैं। सांस्कृतिक और सामाजिक कार्यक्रम भी उत्सव को व्यापक स्वरूप दे रहे हैं।

कुल मिलाकर, आसनसोल के कल्याणपुर की आदि दुर्गापूजा का 46वां वर्ष धार्मिक आस्था, स्थापत्य से प्रेरित सजावट और पारंपरिक प्रतिमा के मेल के लिए खास है। स्वामीनारायण मंदिर की शैली में तैयार मंडप और श्रीकृष्ण की लीलाओं की प्रस्तुति इस वर्ष श्रद्धालुओं का ध्यान खींच सकती है। अब दुर्गापूजा के दौरान यह देखना दिलचस्प होगा कि मंदिर आधारित इस अनूठी कल्पना और पारंपरिक मां दुर्गा की प्रतिमा का संगम आगंतुकों को कितना आकर्षित करता है।

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