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मिड-डे मील पर बंगाल सरकार का बड़ा यू-टर्न! अक्षय पात्र की मंजूरी रद्द, चार जिलों में पुरानी व्यवस्था लागू

Moutushi · 15 September 2026, 10:05 AM

कोलकाता: पश्चिम बंगाल में सरकारी स्कूलों के बच्चों को मिलने वाले मिड-डे मील यानी पीएम पोषण योजना को लेकर राज्य सरकार के एक फैसले ने नई चर्चा छेड़ दी है। इस्कॉन से जुड़े माने जाने वाले ‘अक्षय पात्र फाउंडेशन’ को राज्य के चार जिलों के चिन्हित स्कूलों में मिड-डे मील पहुंचाने की दी गई मंजूरी अब वापस ले ली गई है। स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से 11 सितंबर को जारी निर्देश के बाद फिलहाल संबंधित स्कूलों में पहले से चली आ रही व्यवस्था के तहत ही बच्चों को भोजन उपलब्ध कराया जाएगा।

राज्य सरकार ने 21 अगस्त को अक्षय पात्र फाउंडेशन को हावड़ा, पुरुलिया, उत्तर 24 परगना और पूर्व मेदिनीपुर के कुछ क्षेत्रों में पीएम पोषण योजना के तहत भोजन पहुंचाने की जिम्मेदारी देने को मंजूरी दी थी। लेकिन महज कुछ सप्ताह बाद ही यह फैसला वापस ले लिया गया। विभागीय निर्देश के अनुसार, संबंधित जिलों के अधिकारियों को मंजूरी वापस लिए जाने की जानकारी दे दी गई है।

चार जिलों के कई क्षेत्रों पर फैसले का असर

सरकारी निर्देश के दायरे में उत्तर 24 परगना जिले के विधाननगर, दमदम और राजारहाट-न्यू टाउन क्षेत्र के अलावा हावड़ा और पुरुलिया जिले के संबंधित स्कूल शामिल हैं। पूर्व मेदिनीपुर जिले के नंदीग्राम-1 और नंदीग्राम-2 ब्लॉक भी इस व्यवस्था में शामिल थे।

अक्षय पात्र को जिम्मेदारी दिए जाने के बाद संबंधित जिला प्रशासन और पीएम पोषण योजना से जुड़े अधिकारियों को प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए थे। हालांकि अब उच्च अधिकारियों के निर्देश के बाद पूरी प्रक्रिया रोक दी गई है। फिलहाल स्कूलों में भोजन वितरण को लेकर तत्काल कोई नई व्यवस्था लागू नहीं की गई है।

कोलकाता से शुरू हुई थी केंद्रीकृत भोजन व्यवस्था

पश्चिम बंगाल में मिड-डे मील को लेकर केंद्रीकृत रसोई और भोजन आपूर्ति की व्यवस्था पहले कोलकाता में शुरू की गई थी। राज्य सरकार की ओर से उस समय यह विचार रखा गया था कि यदि व्यवस्था राजधानी में सफल रहती है, तो इसे राज्य के अन्य हिस्सों में भी विस्तार दिया जा सकता है।

कोलकाता के कुछ स्कूलों में भोजन पहुंचाने की व्यवस्था को लेकर शुरुआती दौर में कई तरह की शिकायतें और विवाद सामने आए थे। इनमें भोजन पहुंचने में देरी और शाकाहारी भोजन को लेकर आपत्तियां शामिल थीं। बाद में विद्यार्थियों को अलग से अंडा उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी की गई।

वर्तमान में कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के स्कूलों में पीएम पोषण योजना के तहत भोजन आपूर्ति का काम ‘अन्नामृत फाउंडेशन’ से जुड़ा हुआ है। अगस्त से करीब 500 स्कूलों में भोजन पहुंचाने की जिम्मेदारी इस संस्था को दिए जाने की जानकारी सामने आई थी।

ऐसे मिली थी अक्षय पात्र को मंजूरी

स्कूल शिक्षा विभाग की 21 अगस्त की अधिसूचना के अनुसार, अक्षय पात्र फाउंडेशन की ओर से स्कूलों में भोजन आपूर्ति का प्रस्ताव सरकार के समक्ष रखा गया था। प्रस्ताव पर विचार करने के बाद राज्य सरकार ने चार जिलों के चिन्हित क्षेत्रों में संस्था के माध्यम से भोजन पहुंचाने को मंजूरी दी थी।

इसके बाद संबंधित जिला प्रशासन को संस्था के साथ समन्वय कर प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए थे। योजना के तहत कोलकाता से बाहर भी केंद्रीकृत तरीके से तैयार भोजन विद्यार्थियों तक पहुंचाने की दिशा में कदम उठाया जाना था।

लेकिन 11 सितंबर को स्कूल शिक्षा विभाग की ओर से जारी नए निर्देश ने पूरी तस्वीर बदल दी। इसमें बताया गया कि उच्च अधिकारियों के निर्देश के अनुसार अक्षय पात्र फाउंडेशन को दी गई मंजूरी वापस ले ली गई है।

इस्कॉन के नाम पर पहले भी उठा था विवाद

मिड-डे मील व्यवस्था में इस्कॉन और उससे जुड़े संगठनों की भूमिका को लेकर पहले भी कानूनी सवाल उठ चुके हैं। मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा था। अगस्त में इस्कॉन की ओर से याचिकाकर्ता को भेजे गए पत्र में कहा गया था कि कोलकाता नगर निगम क्षेत्र के स्कूलों में मिड-डे मील की जिम्मेदारी इस्कॉन को नहीं दी गई है।

इस्कॉन ने यह भी स्पष्ट किया था कि वह कोलकाता नगर निगम क्षेत्र या पश्चिम बंगाल के किसी अन्य हिस्से में मिड-डे मील वितरण के काम से सीधे तौर पर जुड़ा नहीं है। संस्था के अनुसार, कोलकाता में भोजन आपूर्ति करने वाले अन्नामृत फाउंडेशन का प्रबंधन बोर्ड और ट्रस्टी बोर्ड तथा इस्कॉन की संचालन समिति कानूनी रूप से अलग संस्थाएं हैं।

हालांकि स्कूल शिक्षा विभाग के एक अधिकारी का दावा है कि दोनों संस्थाएं अलग होने के बावजूद उनके बीच संबंध हैं। इसी वजह से इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर बहस जारी रही है।

अंडे के खर्च और बजट को लेकर भी सवाल

अक्षय पात्र की मंजूरी वापस लिए जाने के बाद इसके पीछे की वास्तविक वजह को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। विभाग की ओर से फिलहाल इतना ही कहा गया है कि यह निर्णय उच्च अधिकारियों के निर्देश पर लिया गया है।

शिक्षकों के एक वर्ग का मानना है कि विद्यार्थियों को अलग से अंडा उपलब्ध कराने के खर्च का सवाल भी इस पूरे मामले से जुड़ा हो सकता है। शिक्षकों के अनुसार, प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर भोजन के लिए क्रमशः 10 रुपये और 10 रुपये 17 पैसे का प्रावधान बताया गया है। ऐसे में भोजन और अतिरिक्त पोषण सामग्री की व्यवस्था को लेकर प्रशासनिक तथा वित्तीय जटिलताएं सामने आ सकती हैं।

विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, शुरुआत में अंडे के आवंटन को भी संबंधित संस्था के माध्यम से कराने की बात तय हुई थी, लेकिन बाद में इस विषय में आगे कोई निर्णय नहीं हुआ।

शिक्षक संगठनों ने क्या कहा?

बंगीय शिक्षक व शिक्षाकर्मी समिति के महासचिव स्वपन मंडल ने दावा किया कि उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना किसी संस्था के माध्यम से मिड-डे मील संचालन करना संभव नहीं है। वहीं पश्चिम बंगाल मिड-डे मील कर्मचारी यूनियन की महासचिव मधुमिता बनर्जी ने सरकार के ताजा फैसले को अपने संगठन के आंदोलन की जीत बताया।

उनका दावा है कि बिना निविदा प्रक्रिया के किसी संस्था को इस प्रकार भोजन आपूर्ति की जिम्मेदारी देना उचित नहीं है। हालांकि इस संबंध में सरकार की ओर से मंजूरी वापस लेने के पीछे विस्तृत कारण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया गया है।

अब आगे क्या होगा?

फिलहाल चार जिलों के संबंधित स्कूलों में पहले की तरह पीएम पोषण योजना जारी रहने की संभावना है। अक्षय पात्र फाउंडेशन को दी गई मंजूरी वापस लिए जाने के बाद यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार भविष्य में इन क्षेत्रों में भोजन आपूर्ति के लिए क्या व्यवस्था अपनाती है।

मिड-डे मील योजना सीधे तौर पर लाखों विद्यार्थियों के पोषण और विद्यालयों में उनकी उपस्थिति से जुड़ी है। इसलिए किसी भी नई व्यवस्था में भोजन की गुणवत्ता, समय पर आपूर्ति, पोषण मानक, वित्तीय पारदर्शिता और प्रशासनिक प्रक्रिया जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण रहेंगे। अब निगाह इस बात पर है कि सरकार इस फैसले को लेकर आगे कोई विस्तृत स्पष्टीकरण देती है या नहीं।

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