कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को डायमंड हार्बर के ‘सेवाश्रय’ स्वास्थ्य शिविर से जुड़े कथित गलत इलाज के मामले में कलकत्ता हाई कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने फिलहाल उनके खिलाफ किसी भी तरह की कठोर कार्रवाई पर रोक लगा दी है और उनकी सुरक्षा 30 नवंबर तक बरकरार रखने का निर्देश दिया है। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अभिषेक बनर्जी को जांच में सहयोग करना होगा। पुलिस को यदि उनसे पूछताछ करनी है तो कम से कम 48 घंटे पहले नोटिस देना होगा।
सोमवार को न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की पीठ में मामले की सुनवाई के दौरान अभिषेक बनर्जी के खिलाफ दर्ज मामलों और बार-बार प्राथमिकी दर्ज किए जाने के मुद्दे पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया। सुनवाई के दौरान अदालत की टिप्पणी ने इस मामले को और अधिक राजनीतिक एवं कानूनी चर्चा के केंद्र में ला दिया।
‘काफी हुआ, अब और नहीं’ वाली टिप्पणी से गरमाया मामला
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ पिछले कुछ महीनों में लगातार मामले दर्ज किए जाने पर नाराजगी जताई। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा, “काफी हुआ, अब और नहीं।”
अदालत ने संकेत दिया कि यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ लगातार प्राथमिकी दर्ज होती रहें, तो न्यायालय को उसके अधिकारों की सुरक्षा के लिए हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। इसी क्रम में पीठ ने पश्चिम बंगाल के विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी से जुड़े पुराने मामले का उदाहरण भी सामने रखा।
अदालत ने संकेत दिया कि जरूरत पड़ने पर अभिषेक बनर्जी के मामले में भी उसी तरह का निर्देश दिया जा सकता है, जिसमें अदालत की अनुमति के बिना नई प्राथमिकी दर्ज करने पर रोक लगाई जा सकती है। इस टिप्पणी के बाद मामले का राजनीतिक महत्व और बढ़ गया है।
सेवाश्रय स्वास्थ्य शिविर क्या है और विवाद क्यों?
डायमंड हार्बर में आयोजित ‘सेवाश्रय’ स्वास्थ्य शिविर से संबंधित आरोपों को लेकर अभिषेक बनर्जी ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मामले में कथित तौर पर गलत इलाज से जुड़ी शिकायत और स्वास्थ्य शिविर के संचालन में नियमों के पालन को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
अदालत ने सुनवाई के दौरान यह जानना चाहा कि जिस मरीज के कथित गलत इलाज की बात कही जा रही है, क्या उसके परिवार ने पहले किसी सक्षम चिकित्सा अथवा उपभोक्ता प्राधिकरण के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी।
न्यायालय ने यह भी सवाल उठाया कि यदि अभिषेक बनर्जी स्वयं किसी मरीज के प्रत्यक्ष इलाज में शामिल नहीं थे, तो उन्हें हिरासत में लेकर पूछताछ करने की आवश्यकता आखिर क्यों है।
राज्य की ओर से क्या दलील दी गई?
राज्य सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि अभिषेक बनर्जी भले ही सीधे तौर पर मरीजों के इलाज में शामिल नहीं थे, लेकिन उन्होंने कथित तौर पर आवश्यक नियमों का पालन किए बिना स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया।
राज्य की ओर से क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट से संबंधित कानून का हवाला देते हुए कहा गया कि इस प्रकार की स्वास्थ्य सेवाएं संचालित करने के लिए आवश्यक अनुमति लेना जरूरी है। आरोप यह भी है कि संबंधित अनुमति नहीं ली गई थी। इसके अलावा बिना आवश्यक अनुमति के एक्स-रे और अल्ट्रासोनोग्राफी जैसी सेवाएं उपलब्ध कराने का आरोप भी मामले में उठाया गया है।
हालांकि, इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष अदालत की आगे की सुनवाई और जांच की प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।
गलत इलाज की जांच के लिए सक्षम संस्थाएं मौजूद: हाई कोर्ट
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि यदि वास्तव में किसी मरीज के इलाज में लापरवाही या गलत उपचार हुआ है, तो उसकी जांच के लिए संबंधित सक्षम संस्थाएं मौजूद हैं।
अदालत ने राज्य से पूछा कि शिकायत के समर्थन में संबंधित दस्तावेज और प्रमाण क्या हैं। अदालत ने यह भी कहा कि यदि मरीज या उसके परिवार की ओर से शिकायत की गई है, तो उसके दस्तावेज अदालत के सामने प्रस्तुत किए जाने चाहिए।
इससे मामले में केवल राजनीतिक आरोपों के बजाय कानूनी और तथ्यात्मक आधार पर जांच की आवश्यकता पर अदालत का जोर स्पष्ट दिखाई दिया।
शिकायतकर्ता के चुनावी इतिहास पर भी उठे सवाल
सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता अभिजीत दास उर्फ बॉबी के राजनीतिक और चुनावी इतिहास का मुद्दा भी सामने आया। अदालत ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि शिकायतकर्ता कथित तौर पर पहले दो चुनावों में अभिषेक बनर्जी के खिलाफ चुनाव लड़ चुके हैं और दोनों अवसरों पर हार चुके हैं।
इसके आधार पर अदालत ने शिकायत की सत्यता और उसके पीछे संभावित राजनीतिक संदर्भ को लेकर सवाल उठाया।
हालांकि, शिकायतकर्ता की ओर से पेश वकील जयंत नारायण चट्टोपाध्याय ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि किसी व्यक्ति का चुनाव हार जाना इस बात का आधार नहीं हो सकता कि वह किसी के खिलाफ शिकायत नहीं कर सकता। उन्होंने शिकायत की वैधता को केवल चुनावी परिणामों के आधार पर संदिग्ध मानने पर आपत्ति जताई।
अभिषेक 22 सितंबर के आसपास लौट सकते हैं
अभिषेक बनर्जी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण और अधिवक्ता अयन भट्टाचार्य ने अदालत में पक्ष रखा। सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि अभिषेक बनर्जी 3 सितंबर को विदेश गए हैं और उच्चतम न्यायालय के निर्देश के अनुसार लगभग तीन सप्ताह विदेश में रहेंगे। उनके 22 सितंबर के आसपास लौटने की बात कही गई।
अदालत ने निर्देश दिया कि विदेश से लौटने की जानकारी न्यायालय को दी जानी चाहिए। इसके बाद पुलिस आवश्यकता महसूस होने पर 22 सितंबर के बाद उन्हें पूछताछ के लिए बुला सकती है, लेकिन इसके लिए कम से कम 48 घंटे पहले नोटिस देना होगा।
30 नवंबर तक सुरक्षा, आगे की सुनवाई पर टिकी नजर
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कलकत्ता हाई कोर्ट ने अभिषेक बनर्जी को फिलहाल राहत देते हुए 30 नवंबर तक सुरक्षा प्रदान की है। अदालत ने स्पष्ट किया कि जांच से बचने की अनुमति नहीं है और अभिषेक को जांच में सहयोग करना होगा।
वहीं, बार-बार प्राथमिकी दर्ज किए जाने पर अदालत की कड़ी टिप्पणी ने राजनीतिक गलियारों में भी हलचल बढ़ा दी है। खास तौर पर शुभेंदु अधिकारी के पुराने मामले का उदाहरण दिए जाने से यह संकेत मिला है कि न्यायालय जरूरत पड़ने पर प्राथमिकी दर्ज करने की प्रक्रिया को लेकर भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी कर सकता है।
अब सबकी नजर 22 सितंबर के बाद की घटनाओं और 30 नवंबर को होने वाली आगे की न्यायिक प्रक्रिया पर रहेगी। फिलहाल ‘सेवाश्रय’ मामला कानूनी लड़ाई के साथ-साथ पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी चर्चा का बड़ा केंद्र बन गया है।




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