कोलकाता: जादवपुर विश्वविद्यालय एक बार फिर राजनीतिक और वैचारिक विवाद के केंद्र में आ गया है। विश्वविद्यालय परिसर की दीवारों पर लंबे समय से मौजूद कई विवादित ग्रैफिटी, राजनीतिक संदेश और आपत्तिजनक मानी जा रही लिखावटों को प्रशासन ने सफेद रंग से ढक दिया है। यह कार्रवाई पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की ओर से विश्वविद्यालय परिसर में लिखे गए कथित आपत्तिजनक और देशविरोधी नारों को लेकर सख्त रुख अपनाए जाने के बाद सामने आई है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, विश्वविद्यालय के सामान्य रखरखाव विभाग ने शनिवार को लगभग छह घंटे तक अभियान चलाकर अलग-अलग हिस्सों में मौजूद ऐसी लिखावटों को मिटाया।
इस कार्रवाई के बाद जादवपुर विश्वविद्यालय की दीवारों का राजनीतिक रंग भी काफी हद तक बदल गया है। जिन दीवारों पर अलग-अलग विचारधाराओं, आंदोलनों और राजनीतिक संदेशों से जुड़ी चित्रकारी तथा नारे दिखाई देते थे, वहां अब सफेद रंग नजर आ रहा है। प्रशासन की इस कार्रवाई को लेकर राजनीतिक बहस भी तेज होने की संभावना है, क्योंकि जादवपुर विश्वविद्यालय लंबे समय से छात्र राजनीति, विचारों की अभिव्यक्ति और दीवार लेखन की संस्कृति के लिए जाना जाता रहा है।
मुख्यमंत्री की चेतावनी के बाद तेज हुई कार्रवाई
मामले की शुरुआत विश्वविद्यालय परिसर की कुछ दीवारों पर मौजूद विवादित लिखावटों और चित्रों को लेकर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की आपत्ति से हुई। उन्होंने जादवपुर विश्वविद्यालय में कथित रूप से लगाए गए ‘कश्मीर मांगे आजादी’ और ‘रेड सैल्यूट किषेनजी’ जैसे नारों को लेकर कड़ा रुख अपनाया था। उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर में ऐसी गतिविधियों को स्वीकार नहीं करने की बात कही और संबंधित मामलों में कार्रवाई के संकेत दिए थे।
इसके बाद विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से परिसर में मौजूद विवादित ग्रैफिटी को हटाने की प्रक्रिया शुरू हुई। शनिवार को सामान्य रखरखाव विभाग के कर्मचारियों और ठेकेदार के माध्यम से अलग-अलग स्थानों पर लिखावटों को सफेद रंग से ढक दिया गया। रिपोर्टों के अनुसार, सफाई अभियान को पूरा करने में करीब छह घंटे का समय लगा।
चार्ली चैपलिन के चित्र से लेकर किषेनजी के नारे तक
सफाई अभियान के दौरान विश्वविद्यालय की कई प्रमुख दीवारों पर बनी राजनीतिक ग्रैफिटी हटाई गईं। इनमें डॉ. एच. एल. रॉय भवन के पास चार्ली चैपलिन का एक म्यूरल भी शामिल था, जिसके साथ फासीवाद के खिलाफ तीखा संदेश लिखा हुआ था। इसके अलावा स्नातकोत्तर विज्ञान भवन के पास नाजी सलामी से जुड़ी एक चित्रात्मक ग्रैफिटी और फासीवाद विरोधी संदेश भी सफेद कर दिया गया।
भूगोल विभाग के बाहर ‘कॉमरेड किषेनजी जिंदाबाद’ से जुड़ी लिखावट भी हटाई गई। किषेनजी को लेकर लिखे गए इस नारे ने ही हाल में राजनीतिक विवाद को और ज्यादा हवा दी थी। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया था कि विश्वविद्यालय परिसर में माओवादी नेता किषेनजी के समर्थन में नारे किस आधार पर लिखे जा रहे हैं।
किषेनजी एक प्रमुख माओवादी नेता था और वर्ष 2011 में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया था। विश्वविद्यालय की दीवारों पर उसके नाम से जुड़े नारे सामने आने के बाद मामला राजनीतिक बहस का विषय बन गया।
ओपन-एयर थिएटर की दीवारें भी हुईं साफ
सफाई अभियान केवल एक-दो स्थानों तक सीमित नहीं रहा। विश्वविद्यालय के ओपन-एयर थिएटर की दीवारों पर लिखे कई तीखे राजनीतिक संदेश भी सफेद रंग से ढक दिए गए। इनमें फासीवाद और लोकतंत्र से जुड़े बेहद आक्रामक शब्दों वाली लिखावट शामिल थी।
इसके अलावा शरजील इमाम की तस्वीर के साथ लिखा गया एक राजनीतिक संदेश भी हटाया गया। पैगंबर मोहम्मद से जुड़ा एक कथित उद्धरण और फलस्तीन की स्वतंत्रता के समर्थन में बनाई गई ग्रैफिटी भी सफाई अभियान के दौरान ढक दी गई। विभिन्न स्थानों पर मौजूद इन चित्रों और संदेशों को हटाए जाने के बाद विश्वविद्यालय परिसर की दीवारें पहले की तुलना में काफी अलग दिखाई देने लगी हैं।
प्रशासन ने विवाद से बचने की बताई वजह
विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, सामान्य रखरखाव विभाग को ग्रैफिटी हटाने की जिम्मेदारी दी गई थी। अधिकारी के मुताबिक, प्रशासन का उद्देश्य किसी नए विवाद को जन्म देना नहीं था और इसी कारण सफाई का काम ठेकेदार को सौंपा गया।
रिपोर्टों के अनुसार, सामान्य रखरखाव विभाग के कर्मचारियों और दैनिक मजदूरों ने अलग-अलग भवनों और दीवारों पर जाकर विवादित लिखावटों को ढका। पूरे अभियान में लगभग छह घंटे का समय लगा।
जादवपुर की दीवारें और छात्र राजनीति
जादवपुर विश्वविद्यालय की दीवारें लंबे समय से केवल ईंट और सीमेंट की सतह नहीं रही हैं। यहां छात्र संगठनों और विभिन्न राजनीतिक विचारधाराओं से जुड़े संदेश, चित्र और नारे विश्वविद्यालय की राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में ग्रैफिटी को सफेद रंग से ढकने का फैसला केवल सफाई की कार्रवाई नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति और परिसर की राजनीतिक संस्कृति को लेकर नई बहस भी पैदा कर सकता है।
एक ओर प्रशासन और सरकार का तर्क है कि शिक्षण संस्थानों में हिंसक, आपत्तिजनक या कथित रूप से देशविरोधी संदेशों के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। दूसरी ओर, विश्वविद्यालय परिसर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक विचारों के प्रदर्शन को लेकर अलग-अलग छात्र एवं राजनीतिक संगठनों की अपनी राय रही है।
इसी वजह से ग्रैफिटी हटाए जाने की कार्रवाई आने वाले दिनों में राजनीतिक विवाद का नया मुद्दा बन सकती है। हालिया रिपोर्टों में वामपंथी नेताओं की ओर से दीवार लेखन पर सफेदी किए जाने को लेकर सवाल उठाए जाने की बात भी सामने आई है।
आगे क्या होगा, इस पर नजर
फिलहाल विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कई विवादित ग्रैफिटी और लिखावटें हटाई जा चुकी हैं। हालांकि परिसर की सभी दीवारों पर मौजूद राजनीतिक लिखावटों का क्या होगा, इसको लेकर चर्चा जारी है। कुछ संगठनों की ओर से बाकी विवादित लिखावटों को भी हटाने की मांग की गई है।
जादवपुर विश्वविद्यालय में इस कार्रवाई के बाद अब नजर इस बात पर है कि छात्र संगठन और शिक्षक समुदाय इस कदम पर किस तरह प्रतिक्रिया देते हैं। क्या विश्वविद्यालय परिसर में राजनीतिक दीवार लेखन की पुरानी संस्कृति पर पूरी तरह रोक लगेगी या फिर नए संदेश और ग्रैफिटी दोबारा सामने आएंगी, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
फिलहाल इतना तय है कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की सख्त टिप्पणी के बाद जादवपुर विश्वविद्यालय प्रशासन ने विवादित ग्रैफिटी के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की है। छह घंटे चले सफाई अभियान ने परिसर की कई चर्चित दीवारों का रंग बदल दिया है और इसके साथ ही विश्वविद्यालय में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, छात्र राजनीति, राष्ट्रीयता और शिक्षण संस्थानों की मर्यादा को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है।





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