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डॉक्टरों को महंगे तोहफे और विदेश यात्राएं देने पर लगेगी लगाम, सुप्रीम कोर्ट सख्त

Moutushi · 8 October 2026, 3:19 PM

नई दिल्ली: दवा कंपनियों की ओर से डॉक्टरों को महंगे तोहफे, विदेश यात्राएं, सम्मेलन में भाग लेने की सुविधाएं और अन्य लाभ देकर अपनी दवाओं को बढ़ावा देने की कथित प्रथा पर अब सख्ती की तैयारी शुरू हो गई है। सुप्रीम कोर्ट ने दवा कंपनियों की विपणन गतिविधियों में कथित अनैतिक तौर-तरीकों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार को एक विशेष समिति गठित करने का निर्देश दिया है। यह समिति मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करेगी और जरूरत पड़ने पर ऐसे उपायों की सिफारिश करेगी, जिनसे फार्मास्युटिकल कंपनियों और चिकित्सकों के बीच अनुचित लाभ के लेन-देन पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।

यह मामला फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशंस ऑफ इंडिया की याचिका से जुड़ा है। संगठन ने दवा कंपनियों की विपणन गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी व्यवस्था बनाने की मांग की है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ कर रही है।

डॉक्टरों को ‘फ्रीबीज’ देने का मामला क्या है?

दवा कंपनियों द्वारा चिकित्सकों के साथ प्रचार और विपणन के दौरान विभिन्न प्रकार के लाभ देने का मुद्दा लंबे समय से चर्चा में रहा है। इनमें महंगे उपहार, यात्रा की सुविधा, सम्मेलन या विदेश यात्रा का खर्च उठाना और अन्य प्रकार की सुविधाएं शामिल होने के आरोप लगाए जाते रहे हैं।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यदि किसी कंपनी की ओर से डॉक्टर को कोई आर्थिक या अन्य लाभ दिया जाता है और उसके बदले किसी विशेष दवा को लिखने के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रभाव डाला जाता है, तो इसका असर मरीजों के इलाज और दवाओं की लागत पर पड़ सकता है। इसी वजह से याचिका में ऐसी गतिविधियों के लिए स्पष्ट और प्रभावी कानूनी व्यवस्था की मांग की गई है।

केंद्र को समिति बनाने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष केंद्र सरकार की ओर से पहले ही यह संकेत दिया गया था कि फार्मास्युटिकल कंपनियों की कथित अनैतिक विपणन गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए मजबूत व्यवस्था की आवश्यकता है। सितंबर 2026 में केंद्र की ओर से तीन सदस्यीय समिति गठित करने की बात भी अदालत के सामने रखी गई थी, ताकि यह देखा जा सके कि क्या इसके लिए अलग से वैधानिक ढांचा बनाया जाना चाहिए।

अब अदालत के निर्देश के बाद समिति के काम का महत्व और बढ़ गया है। समिति से यह उम्मीद की जा रही है कि वह मौजूदा नियमों की कमियों को देखेगी और सरकार को आगे की व्यवस्था को लेकर सुझाव देगी।

मौजूदा नियमों पर भी उठे सवाल

भारत में दवा कंपनियों की विपणन गतिविधियों के लिए यूनिफॉर्म कोड ऑफ फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेज, यानी यूसीपीएमपी, मौजूद है। 2024 में इस व्यवस्था को संशोधित किया गया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान इस बात पर सवाल उठे कि मौजूदा व्यवस्था को कितना प्रभावी ढंग से लागू किया जा सकता है और इसके उल्लंघन पर वास्तविक नियंत्रण किसके हाथ में है।

अदालत में यह मुद्दा भी सामने आया कि केवल चिकित्सकों पर नियम लागू होने से समस्या का पूरा समाधान नहीं हो सकता। यदि किसी लाभ की पेशकश करने वाली कंपनी के खिलाफ प्रभावी वैधानिक कार्रवाई की व्यवस्था नहीं है, तो नियमों के अमल में असमानता पैदा हो सकती है।

सुप्रीम कोर्ट पहले भी जता चुका है चिंता

फार्मास्युटिकल कंपनियों और डॉक्टरों के बीच आर्थिक लाभ के संबंध को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले भी गंभीर टिप्पणी कर चुका है। एपेक्स लेबोरेटरीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम डिप्टी कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स मामले में अदालत ने डॉक्टरों और मरीजों के बीच विश्वास के संबंध तथा दवा कंपनियों की ओर से दिए जाने वाले लाभों के संभावित प्रभाव पर चर्चा की थी।

अदालत के समक्ष यह तर्क भी रखा गया कि यदि दवा कंपनियां डॉक्टरों को अलग-अलग प्रकार के लाभ देती हैं, तो इससे दवा लिखने के निर्णय पर अनुचित प्रभाव पड़ने की संभावना को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

जेनेरिक दवाओं का मुद्दा भी उठा था

इस मामले की पिछली सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने जेनेरिक दवाओं से जुड़े सवाल पर भी मौखिक टिप्पणी की थी। मई 2025 में अदालत के समक्ष यह मुद्दा आया था कि यदि डॉक्टरों के लिए जेनेरिक दवाएं लिखने की वैधानिक व्यवस्था हो, तो महंगी ब्रांडेड दवाओं को बढ़ावा देने से जुड़ी कुछ चिंताओं का समाधान किया जा सकता है। हालांकि, यह अदालत की मौखिक टिप्पणी थी और इसे अंतिम आदेश के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

मरीजों पर पड़ सकता है सीधा असर

फार्मास्युटिकल विपणन व्यवस्था पर बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू मरीज हैं। डॉक्टर द्वारा किसी दवा का चुनाव इलाज की जरूरत के आधार पर होना चाहिए। यदि किसी बाहरी प्रोत्साहन का प्रभाव दवा लिखने के निर्णय पर पड़ता है, तो इससे मरीज के सामने उपलब्ध विकल्प और इलाज का खर्च प्रभावित होने की आशंका रहती है।

इसी कारण याचिकाकर्ताओं ने ऐसी व्यवस्था की मांग की है जिसमें दवा कंपनियों की गतिविधियों की निगरानी, नियमों के उल्लंघन की पहचान और जरूरत पड़ने पर कार्रवाई का स्पष्ट प्रावधान हो।

आगे क्या करेगी समिति?

अब नजर केंद्र सरकार की ओर से गठित होने वाली समिति की सिफारिशों पर रहेगी। समिति यह देख सकती है कि मौजूदा यूसीपीएमपी को पर्याप्त कानूनी मजबूती दी जाए या फार्मास्युटिकल विपणन के लिए अलग वैधानिक व्यवस्था बनाई जाए।

इस मामले में अदालत की आगे की सुनवाई भी महत्वपूर्ण होगी। सितंबर में केंद्र की ओर से समिति के गठन की जानकारी दिए जाने के बाद अदालत ने आदेश सुरक्षित रखा था। अब अदालत के निर्देश के अनुसार आगे की प्रक्रिया में समिति की रिपोर्ट और सरकार की कार्रवाई अहम होगी।

फिलहाल यह साफ है कि डॉक्टरों को महंगे उपहार, विदेश यात्राएं या अन्य लाभ देकर दवा कंपनियों के प्रचार को प्रभावित करने के आरोपों को सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता से लिया है। आने वाले समय में समिति की सिफारिशों और केंद्र की कार्रवाई से यह तय होगा कि इस क्षेत्र में मौजूदा नियमों को किस तरह और कितना मजबूत किया जाता है। साथ ही, किसी भी नई व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य मरीजों के हित, चिकित्सकीय स्वतंत्रता और दवा बाजार में पारदर्शिता सुनिश्चित करना होगा।

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