RSS एजेंडा या आध्यात्मिक संदेश? NIT दुर्गापुर में शंकराचार्य विवाद

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दुर्गापुर।
राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) दुर्गापुर इन दिनों एक विशेष कार्यक्रम को लेकर सियासी तूफान के केंद्र में आ गया है। पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती महाराज आगामी 10 और 11 सितंबर को कैंपस में पहुंचकर छात्रों को ज्ञान देंगे और दीक्षा भी प्रदान करेंगे।

👉 विवाद की शुरुआत
विश्वविद्यालय के निदेशक अरविंद चौबे ने सोमवार को पत्रकार वार्ता कर बताया कि शंकराचार्य युवाओं को ज्ञान देंगे, अवसाद से जूझ रहे छात्रों को मार्गदर्शन करेंगे और जो इच्छुक होंगे वे दीक्षा भी ले सकेंगे। उन्होंने साफ किया कि “युवाशक्ति किसी धर्म की नहीं होती, उनका संदेश सार्वभौमिक है।”

लेकिन जैसे ही यह खबर सामने आई, वाम दल और तृणमूल कांग्रेस ने इसे लेकर भाजपा और आरएसएस पर सीधा हमला बोला।

📌 सीपीएम का आरोप:
सीपीएम नेता बिप्रेंदु चक्रवर्ती ने कहा –
“भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है। यहां विश्वविद्यालय परिसरों में धार्मिक गतिविधियां नहीं होनी चाहिए। केंद्र की बीजेपी और राज्य की तृणमूल सरकार मिलकर धर्मनिरपेक्षता तोड़ना चाहती हैं।”

📌 टीएमसी की आपत्ति:
तृणमूल कांग्रेस प्रवक्ता उज्जल मुखोपाध्याय ने कहा –
“यह कार्यक्रम आरएसएस के इशारे पर हो रहा है। ABVP सोशल मीडिया पर खुलेआम धार्मिक संदेश फैलाती है। हम इसका विरोध करेंगे।”

📌 बीजेपी का पलटवार:
भाजपा के जिला उपाध्यक्ष चंद्रशेखर बंद्योपाध्याय ने पलटवार करते हुए कहा –
“किस धार्मिक गुरु को बुलाया जाएगा, यह संस्थान तय करेगा, न कि राजनीतिक दल। तृणमूल हमेशा एक विशेष समुदाय की राजनीति करती है, इसलिए वह शंकराचार्य के आगमन का विरोध कर रही है।”

👉 विवाद के बीच छात्र भी उलझे
कैंपस के छात्रों का कहना है कि अगर कोई आध्यात्मिक गुरु आकर ज्ञान देता है तो उसमें आपत्ति की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। कुछ छात्रों ने इसे व्यक्तिगत आस्था से जोड़ते हुए कहा कि “हम पर कोई दबाव नहीं है, लेना-न-लेना हमारी स्वतंत्रता है।”

📌 राजनीति बनाम आध्यात्मिकता
यह पहला मौका नहीं है जब किसी शैक्षणिक संस्थान में धार्मिक कार्यक्रम को लेकर विवाद उठा हो। सवाल यही है कि क्या यह ‘भगवाकरण’ और ध्रुवीकरण की साज़िश है या फिर अवसादग्रस्त युवाओं को आध्यात्मिक मार्गदर्शन देने का प्रयास?

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