दुर्गा मंदिर से चुनावी बिगुल! कृष्णदू मुखर्जी ने पूजा कर शुरू किया प्रचार

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आसनसोल:
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र आसनसोल उत्तर विधानसभा क्षेत्र में चुनावी सरगर्मी तेज हो गई है। इसी कड़ी में भाजपा उम्मीदवार कृष्णदू मुखर्जी ने बस्तीन बाजार स्थित श्री श्री दुर्गा माता चैरिटेबल ट्रस्ट दुर्गा मंदिर में पूजा-अर्चना कर अपने चुनाव प्रचार अभियान की औपचारिक शुरुआत की।

मंदिर के कपाट खोलकर की गई इस पूजा के दौरान बड़ी संख्या में समर्थक और स्थानीय लोग मौजूद रहे। धार्मिक माहौल में शंखध्वनि और मंत्रोच्चार के बीच कृष्णदू मुखर्जी ने मां दुर्गा का आशीर्वाद लेकर जीत का संकल्प लिया।

मंदिर को लेकर उठाया बड़ा मुद्दा

पूजा के बाद कृष्णदू मुखर्जी ने एक बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि इस दुर्गा मंदिर में नियमित रूप से सुबह और शाम पूजा नहीं होने दी जाती। उन्होंने इसे आस्था से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताते हुए कहा कि इस स्थिति में बदलाव बेहद जरूरी है।

उन्होंने कहा,
“मंदिर आस्था का केंद्र है, लेकिन यहां नियमित पूजा तक नहीं हो पा रही है। यह स्थिति बदलनी होगी।”

🔔 परिवर्तन के बाद रोज होगी पूजा

कृष्णदू मुखर्जी ने वादा करते हुए कहा कि यदि क्षेत्र में परिवर्तन होता है और उन्हें जनता का समर्थन मिलता है, तो मंदिर के कपाट नियमित रूप से खुले रहेंगे।

उन्होंने कहा कि सुबह-शाम मंदिर में घंटियों की गूंज और मंत्रोच्चार की ध्वनि सुनाई देगी, जिससे क्षेत्र का धार्मिक माहौल और मजबूत होगा।

🚶‍♂️ जनसंपर्क अभियान की शुरुआत

मंदिर में पूजा के बाद कृष्णदू मुखर्जी ने बस्तीन बाजार इलाके में जनसंपर्क अभियान भी चलाया। उन्होंने घर-घर जाकर लोगों से मुलाकात की, उनकी समस्याएं सुनीं और समर्थन की अपील की।

इस दौरान उन्होंने स्थानीय मुद्दों—जैसे सड़क, सफाई, पानी और सुरक्षा—पर भी चर्चा की और समाधान का भरोसा दिलाया।

धार्मिक और राजनीतिक संदेश का मेल

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि चुनाव प्रचार की शुरुआत मंदिर से करना एक मजबूत प्रतीकात्मक संदेश है। इससे न सिर्फ धार्मिक आस्था को जोड़ा गया है, बल्कि स्थानीय मुद्दों को भी प्रमुखता दी गई है।

🔍 राजनीतिक विश्लेषण

आसनसोल उत्तर सीट पर इस बार मुकाबला दिलचस्प होने वाला है। कृष्णदू मुखर्जी ने अपने अभियान की शुरुआत धार्मिक आस्था और स्थानीय मुद्दों के मिश्रण के साथ की है, जो मतदाताओं को प्रभावित कर सकती है।

अब देखना यह होगा कि जनता उनके इस “परिवर्तन” के वादे को कितना समर्थन देती है और चुनावी नतीजों में इसका क्या असर देखने को मिलता है।

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