जामुड़िया (आसनसोल) : विधानसभा चुनाव से पहले प्रचार के मैदान में उतरे तृणमूल उम्मीदवार और जामुड़िया के विधायक हरराम सिंह को पहले ही दिन कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।
👉 सोमवार सुबह जब उन्होंने निगा क्षेत्र के बैरागीबागान आदिवासी पाड़ा से अपने प्रचार अभियान की शुरुआत की, तभी बड़ी संख्या में आदिवासी समुदाय की महिलाओं ने उन्हें घेर लिया और इलाके में विकास कार्यों की कमी को लेकर तीखे सवाल उठाए।
⚠️ “वादे बहुत, काम शून्य”—महिलाओं का फूटा गुस्सा
प्रचार के दौरान महिलाओं ने विधायक से सीधे सवाल करते हुए कहा—
👉 पांच साल तक क्षेत्र में कोई ठोस विकास कार्य क्यों नहीं हुआ?
👉 चुनाव के समय ही नेताओं को जनता की याद क्यों आती है?
👉 महिलाओं के आक्रोश के बीच कुछ समय तक कहासुनी की स्थिति भी बनी रही।
🗣️ विधायक ने दिया आश्वासन, लेकिन सवाल बरकरार
स्थिति को संभालते हुए हरराम सिंह ने कहा—
👉 “बाद में बैठकर चर्चा करेंगे और सभी समस्याओं का समाधान करेंगे।”
हालांकि, पहले इन मुद्दों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई, इस सवाल पर उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया, जिससे लोगों की नाराजगी और बढ़ गई।
😡 वार्ड प्रतिनिधि को भी झेलनी पड़ी नाराजगी
इस दौरान जब तृणमूल कार्यकर्ता और वार्ड काउंसिलर प्रतिनिधि भोला पासवान लोगों से बातचीत करने पहुंचे, तो उन्हें भी विरोध का सामना करना पड़ा।
👉 गुस्साए लोगों ने उन्हें मौके से वापस जाने के लिए मजबूर कर दिया।
🏚️ स्थानीय लोगों के आरोप
आदिवासी समुदाय के लोगों का कहना है—
👉 हर चुनाव से पहले बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं
👉 लेकिन चुनाव के बाद वे वादे अधूरे रह जाते हैं
👉 इसी कारण इलाके में आज भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है।
🏛️ बीजेपी का हमला, विकास का वादा
इस पूरे मामले पर बीजेपी उम्मीदवार बिजन मुखर्जी ने तृणमूल पर निशाना साधा।
👉 उन्होंने कहा कि तृणमूल सरकार ने कभी भी जनता के लिए काम नहीं किया
👉 “जब पांच साल बाद विधायक जनता के बीच आते हैं, तो उनका गुस्सा सामने आना स्वाभाविक है।”
👉 साथ ही उन्होंने दावा किया कि यदि उन्हें मौका मिला, तो वे क्षेत्र का समग्र विकास सुनिश्चित करेंगे।
📊 चुनाव से पहले बढ़ी सियासी गर्मी
इस घटना ने साफ कर दिया है कि चुनाव से पहले जनता अब पहले से ज्यादा जागरूक और सवाल पूछने को तैयार है।
👉 नेताओं के लिए अब केवल वादे नहीं, बल्कि जमीनी काम ही सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है।
📌 निष्कर्ष:
जामुड़िया की यह घटना सिर्फ एक विरोध नहीं, बल्कि जनता की बदलती सोच और बढ़ती जागरूकता का संकेत है।
👉 अब देखना होगा कि चुनावी मैदान में उतरने वाले नेता इन सवालों का जवाब कैसे देते हैं और जनता का भरोसा जीतने के लिए क्या कदम उठाते हैं।














