नई दिल्ली, 17 मई 2025:
आज के दौर में जब स्वास्थ्य सेवाएं महंगी और कई बार असमान रूप से वितरित हो रही हैं, ऐसे में इंटरनेशनल इक्विटेबल ह्यूमन राइट्स सोशल काउंसिल के इंटरनेशनल चेयरमैन संजय सिन्हा ने एक अहम और जागरूकता फैलाने वाला बयान दिया है –
“हर व्यक्ति, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, लिंग या आर्थिक स्थिति से हो, स्वास्थ्य के अधिकार का समान रूप से हकदार है।”
“राइट टू हेल्थ” विषय पर विशेष बातचीत में श्री सिन्हा ने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के मुताबिक नस्ल, रंग, लिंग, विकलांगता, यौन अभिविन्यास, सामाजिक या आर्थिक स्थिति जैसी किसी भी भिन्नता के बावजूद हर व्यक्ति को बिना भेदभाव के गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा मिलनी चाहिए।
🔍 स्वास्थ्य के अधिकार का क्या मतलब है?
संजय सिन्हा के अनुसार –
- यह केवल अस्पताल या डॉक्टर की सुविधा तक सीमित नहीं है।
- इसमें अपने शरीर और स्वास्थ्य पर नियंत्रण, महिलाओं और लड़कियों के यौन और प्रजनन अधिकार, लैंगिक हिंसा से सुरक्षा, और सभी को समान रूप से स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच शामिल है।
वे कहते हैं –
“अगर कोई महिला या बच्चा लिंग आधारित हिंसा का शिकार होता है, तो यह सिर्फ एक अपराध नहीं बल्कि स्वास्थ्य अधिकार का सीधा उल्लंघन भी है।”
🧭 सिस्टम को जवाबदेह बनाने की ज़रूरत
संजय सिन्हा ने यह भी बताया कि स्वास्थ्य सेवाओं में असमानता को दूर करने के लिए सरकारों को चाहिए कि वे
- यह जानें कि कौन पीछे छूट रहा है और क्यों,
- उन कारणों को दूर करने के प्रभावी उपाय करें,
- और स्वास्थ्य नीति में मानवाधिकार और समानता के दृष्टिकोण को शामिल करें।
“नस्लीय भेदभाव का शिकार समुदायों को उनकी संस्कृति के अनुरूप और गुणवत्तापूर्ण सेवाओं तक पहुंच मिलनी चाहिए। यही सच्चा मानवाधिकार है।”
📣 WHO का विजन और भारत में ज़मीन पर सच्चाई
जहाँ एक ओर WHO एक इंटरसेक्शनल अप्रोच की बात करता है, वहीं भारत जैसे देश में अब भी कई हाशिए पर जी रहे समुदायों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिलतीं। संजय सिन्हा ने सरकारों से अपील की कि –
“हमें सिर्फ नीति नहीं, नीति का इंप्लीमेंटेशन देखना होगा। और यह तभी होगा जब हम सिस्टम को जवाबदेह बनाएंगे।”













