जन्मदिन विशेष. सिर्फ देश नहीं, दिलों पर भी ‘राज’ करते हैं पीएम मोदी

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नई दिल्ली (प्रेम शंकर चौबे) : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 75 साल के हो गए हैं. नरेंद्र मोदी के रूप में बीजेपी को एक करिश्माई नेता मिला, जिसे पार्टी ने अपने नारे और केंद्र में रखकर गढ़ा, उसका सियासी लाभ उसे मिला. नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल और हिंदूवादी चेहरे ने देशभर में जातिवादी राजनीति की दीवार तोड़ दी, जिसके चलते कई सियासी क्षत्रपों की सियासत हाशिए पर चली गई. गुजरात से दिल्ली की गद्दी यानि राज्य से केंद्र तक का सफर तय करने वाले प्रधानमंत्री मोदी ने देश की राजनीति के तौर-तरीके को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है. यही वजह है कि आज पीएम मोदी सिर्फ भारत पर ही नहीं, बल्कि देश-दुनिया के करोड़ों लोगों के दिलों पर एकतरफा ‘राज’ करते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक सफर की कहानी एक असाधारण दस्तावेज है. 2001 से 2014 तक गुजरात में मुख्‍यमंत्री रहे. और गुजरात को भाजपा का अजेय किला बना दिया. फिर केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा को 2014 में सत्‍ता दिलाई. इससे पहले 1984 में यह कामयाबी कांग्रेस को मिली थी. फिर मोदी लगातार 11 वर्षों से सत्ता में कायम हैं. मुख्‍यमंत्री और प्रधानमंत्री के कार्यकाल का जोड़ लिया जाए तो करीब 25 वर्ष से किसी न किसी तरह सत्‍ता का संचालन कर रहे हैं. यह इसलिए खास हो जाता है कि इंटरनेट के दौर में जब बहुत आसानी से बड़े से बड़े नेता को एंटी-इनकंबेंसी खा जाती है, मोदी अनूठे हैं जिन्‍हें प्रो-इनकंबेंसी का फायदा मिल रहा है. इसीलिए ग्‍लोबल लीडर्स के सर्वोच्‍च गुट में प्रधानमंत्री मोदी का मुकाम ऊपर ही रहा है. दुनिया के कई नेता अचरज जताते हैं कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में मोदी अपनी लोकप्रियता को कैसे बरकरार रखे हुए हैं?

India Today के अगस्त 2024 और अगस्त 2025 में हुए मूड ऑफ द नेशन सर्वे के मुताबिक 50% से अधिक भारतीय उनके नेतृत्व में अपनी आस्था रखते हैं. जबकि दुनिया में उनके समकालीन लोकतांत्रिक देशों के नेताओं की दुर्गति सबके सामने हैं. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप लगातार अपनी लोकप्रियता खो रहे हैं, यूरोप के कई देशों में नेतृत्व का संकट है, भारत के पड़ोसी देशों का हाल हम देख ही रहे हैं. ऐसी दशा में भी मोदी हर रोज लोकप्रियता की नई सीढ़ी चढ़ रहे हैं यह किसी करिश्‍मे से कम नहीं है.

मोदी ने खत्म कर दी जाति की पिच पर खड़े क्षत्रपों की सियासत

पीएम मोदी ने जाति के बिसात पर सत्ता के सिंहासन पर विराजमान होने वाले क्षत्रपों की राजनीति को पूरी तरह खत्म कर दिया. मोदी पटेल समाज के प्रभाव वाले गुजरात में 12 साल तक मुख्यमंत्री रहे. गुजरात में पटेल सियासत को जिस तरह सियासी हाशिए पर रखा, उसी तर्ज़ पर प्रधानमंत्री बनने के बाद जाट प्रभाव वाले हरियाणा में गैर-जाट राजनीति को तवज्जो दी और मराठा प्रभाव वाले महाराष्ट्र में गैर-मराठा को साधकर कमल खिलाया. मोदी ने हरियाणा में गैर-जाट राजनीति को तवज्जो दी. 2014 के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने हरियाणा में गैर-जाट, महाराष्ट्र में गैर-मराठा और झारखंड में गैर-आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाना मोदी की राजनीतिक सूझबूझ और दूरदृष्टि का उदाहरण है.

प्रधानमंत्री मोदी की सियासत पर नज़र डालें तो साफ है कि वह परंपरागत राजनीति से अलग हटकर अपनी सियासी लकीर खींचते हैं. नरेंद्र मोदी बीजेपी के लिए एक ट्रंप कार्ड हैं, क्योंकि मुख्यमंत्री रहते गुजरात में बीजेपी की सियासी जड़ें ऐसी जमाईं कि दोबारा कांग्रेस की फसल खड़ी नहीं हो पाई. प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपनी क्षमता को आगे बढ़ाया है जिसे उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में निखारा था.

प्रधानमंत्री मोदी की ज़मीन से जुड़े रहने, चुनावी वादों को अमलीजामा पहनाने और सियासी नैरेटिव सेट करने की जो कला है, वह बीजेपी को सिर्फ सफलता के मुकाम पर नहीं ले गई, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी को आगे ले जाती है. प्रधानमंत्री मोदी में सियासी असफलताओं से उबरने और उनके रास्ते में खड़ी बाधाओं को गिराने की क्षमता भी है. इसी के बलबूते उन्होंने देश की राजनीति के तौर-तरीके को बदलकर रख दिया. बीजेपी की राह में बाधा बन रही जातिवादी राजनीति को तोड़कर खासकर हिंदी भाषी राज्यों में बदल दिया.

बीजेपी की ब्राह्मण और बनियों की छवि से बाहर निकालकर दलित, ओबीसी और आदिवासी वोटरों को जोड़ने का काम प्रधानमंत्री मोदी ने किया. प्रधानमंत्री मोदी खुद भी गुजरात के ओबीसी समाज से आते हैं, जिसकी जनसंख्या बहुत कम है. इसके बावजूद गुजरात के 12 साल तक मुख्यमंत्री रहे और तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने विकास पर काम किया तो गरीबों को ध्यान में रखकर जनकल्याण योजनाएँ शुरू कीं, जिससे गरीबों के बीच उनकी मसीहा जैसी छवि गढ़ी गई, जिसके दम पर जाति की राजनीति को काउंटर करने में सफल रहे.

हिंदुत्व के एजेंडे से निकली नई सियासत

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद बीजेपी के हिंदुत्व के एजेंडे को सियासी धार मिली है. गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद से नरेंद्र मोदी की ‘हिंदू हृदय सम्राट’ की छवि बनी और प्रधानमंत्री बनने के बाद उसे मजबूती मिली. अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन से लेकर उद्घाटन तक प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी एक बड़ा सियासी संदेश थी. जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हटाने के साथ उसे दो टुकड़ों में भी बाँट दिया. ट्रिपल तलाक खत्म करना और राम मंदिर का निर्माण भी मोदी सरकार के मुख्य एजेंडे का हिस्सा रहे. बीजेपी की नज़र मुस्लिमों के पसमांदा मुसलमानों पर है, जिन्हें साधने के लिए लगातार कवायद की जा रही है. मोदी ने ही पसमांदा और बोहरा मुस्लिमों को जोड़ने का मंत्र बीजेपी को दिया है. मोदी ने सोशल इंजीनियरिंग का नया फॉर्मूला सेट किया है.

मोदी की 7 खूबियां जो उन्‍हें चुनावी राजनीति में अजेय बनाती हैं

विपक्ष की लगातार घेरेबंदी, आलोचनाएं, आर्थिक चुनौतियां, महामारी और सांप्रदायिक विवादों के बावजूद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि ‘मजबूत नेता’ की बनी हुई है. आइये देखते हैं कि वो कौन से कारण हैं जिनके चलते पिछले 25 साल में, जिसमें 13 साल सीएम और 11 साल पीएम रहने के बावजूद वे भारत की चुनावी राजनीति में अजेय बने हुए हैं.

1. नैरेटिव सेट करने में प्रधानमंत्री मोदी का कोई जवाब नहीं : राष्ट्रवाद, विकास, धर्म, या कल्याणकारी योजनाएं हों, मोदी ने हर मुद्दे पर जनता के बीच मजबूत संदेश स्थापित किया. उनकी यह कला विपक्ष को जवाब देने में उलझाए रखती है, जिससे वह अपने एजेंडे को प्रभावी ढंग से सामने नहीं ला पाता. सर्जिकल स्ट्राइक (2016), बालाकोट एयर स्ट्राइक (2019), और ऑपरेशन सिंदूर (2025) ने उनकी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ की छवि बनाई.

आर्टिकल 370 का खात्मा (2019) और सीएए-एनआरसी ने ‘मजबूत भारत’ का संदेश दिया. मोदी ने ‘विकसित भारत 2047’ का विजन पेश किया. जीडीपी 2.04 ट्रिलियन (2014) से 3.94 ट्रिलियन (2025) हो गई. विपक्ष ने बेरोजगारी (8.5%) और महंगाई (5% CPI) पर हमला किया, लेकिन मोदी की ‘आत्मनिर्भर भारत’ और डिजिटल इंडिया ने युवाओं को आकर्षित किया.

राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा (22 जनवरी 2024) और ‘जय श्री राम’ नारे और काशी विश्वनाथ कॉरिडोर ने 80% हिंदू आबादी को एकजुट किया. विपक्ष, खासकर कांग्रेस, ने इसे ‘धर्म की राजनीति’ कहा पर मोदी कभी आलोचनाओं से डिगे नहीं. उनके मंदिरों में दर्शन-पूजन करने की विपक्ष ने बहुत आलोचना की पर वो अपने पहले टर्म से आज तक मंदिरों में जा रहे हैं. उनकी कई बातों के लिए आलोचना होती है पर वो आलोचनाओं से नहीं डरते.

2. घोर विरोधियों को अपना बनाते गए, और विरोध कमजोर पड़ता गया : विरोधियों को मित्र बनाने की कला के चलते नरेंद्र मोदी अपने समकालीन नेताओं से काफी आगे निकल जाते हैं. उनकी सबसे बड़ी खूबी है कि वे अपने घोर विरोधियों को भी सहयोगी बना लेते हैं. कई नेता, जिन्होंने कभी मोदी के लिए अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया, आज सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर हैं या उनके सहयोगी हैं.

यह उनकी रणनीति और वैचारिक लचीलेपन का परिणाम है, जो विपक्ष को कमजोर करता है और बीजेपी को मजबूत करता है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कभी बीजेपी के कट्टर आलोचक हुआ करते थे. 2013 में उन्होंने बीजेपी से गठबंधन तोड़ा और 2014 में कहा, मोदी का मॉडल गुजरात दंगों पर आधारित है. लेकिन 2017 और फिर जनवरी 2024 में वे एनडीए में लौटे. 2025 बिहार विधानसभा चुनावों के लिए साझा घोषणा पत्र जारी करने की तैयार इस एकजुटता का प्रतीक है. नीतीश आज एनडीए के प्रमुख चेहरों में से एक हैं, और उनकी ईबीसी-कुर्मी वोट बैंक (40%) बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण है.

अभी 2 दिन पहले हमने देखा कि किस तरह वो कांग्रेस नेता और निर्दलीय सांसद पप्पू यादव (राजेश रंजन) को महत्व दिया. पप्पू अभी कुछ दिन पहले तक मोदी पर तीखे हमले बोलते रहे हैं. जनवरी 2025 में उन्होंने कहा, मोदी सत्ता के लिए कोई भी पाप कर सकते हैं. लेकिन 15 सितंबर 2025 को पूर्णिया रैली में मोदी ने उन्हें मंच पर जगह दी, बल्कि उनसे सहृदयता के साथ बातचीत भी की. उनकी यह रणनीति सीमांचल के यादव-मुस्लिम वोट (20-25%) को लुभाने की कोशिश थी.

गुलाम नबी आजाद, पूर्व कांग्रेस नेता, ने 2019 तक मोदी की आलोचना की. जुलाई 2025 में उन्होंने कहा, देश को मोदी पर विश्वास करना चाहिए, न कि ट्रंप पर. यह अप्रत्यक्ष समर्थन था, पर बीजेपी के लिए संबल की तरह था. बीजेपी ने आजाद को केंद्र में कोई पद नहीं दिया, लेकिन उनकी तटस्थता ने विपक्ष को कमजोर किया.

इसी तरह, असम के हिमंता बिस्वा सरमा, जो कभी कांग्रेस में थे और 2014 में मोदी की आलोचना करते थे, 2015 में बीजेपी में शामिल हुए. आज वे असम के मुख्यमंत्री हैं और पूर्वोत्तर में बीजेपी की ताकत हैं. दिल्ली में बीजेपी के नेता कपिल मिश्रा कभी मोदी के घोर आलोचक होते थे, आज दिल्ली सरकार में मंत्री बने हुए हैं. ऐसे तमाम लोग हैं जो कभी मोदी के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते थे पर पीएम ने माफ किया और अपने साथ लेकर खुद को औप मजबूत बनाते गए.

3. मोदी के दक्षिणपंथी-समाजवाद ने समर्थक लाभार्थियों की फौज खड़ी कर दी : नरेंद्र मोदी की राजनीतिक छवि को लेकर यह कथन कि वे समाजवादी काया के साथ दक्षिणपंथी आत्मा रखते हैं. उनकी सामाजिक-आर्थिक योजनाएं गरीबों और वंचितों के उत्थान पर केंद्रित हैं, जो समाजवादी विचारधारा, सामाजिक कल्याण और समावेशिता से मेल खाती हैं. दूसरी ओर, उनके विचार और नीतियां हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक एकता पर आधारित हैं, जो दक्षिणपंथी विचारों की धुरी हैं. जन धन योजना ने 125 मिलियन बैंक खाते खोलकर वित्तीय समावेशन को बढ़ावा दिया, जिससे 70% ग्रामीण गरीबों को पहली बार बैंकिंग सिस्टम से जोड़ा गया.

आयुष्मान भारत ने 720 मिलियन लोगों को मुफ्त स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया, जो सामाजिक कल्याण का प्रतीक है. उज्ज्वला योजना के तहत 9 करोड़ महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन दिए गए, जिसने ग्रामीण स्वास्थ्य और पर्यावरण को बेहतर किया. स्वच्छ भारत मिशन ने 11 करोड़ शौचालय बनाकर खुले में शौच को 60% से घटाकर 10% किया.पीएम-किसान योजना ने 12 करोड़ किसानों को सालाना 6,000 रुपये की सहायता दी, जो वामपंथी नीतियों की तरह गरीबों को प्रत्यक्ष लाभ देती है.

मोदी के विचार और नीतियां दक्षिणपंथी को दिखाती हैं. राम मंदिर निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर ने हिंदू सांस्कृतिक पुनरुत्थान को बढ़ावा दिया. सीएए-एनआरसी ने राष्ट्रवाद और हिंदू पहचान को मजबूत किया, जो दक्षिणपंथी आधार (80% हिंदू आबादी) को अपील करता है. मोदी की रैलियों में ‘भारत माता की जय’ और ‘जय श्री राम’ जैसे नारे हिंदुत्व को जन-आंदोलन बनाते हैं. जाहिर है कि अपनी इन्हीं नीतियों के चलते वे गरीब-गुरबा ले कर अमीर-धनाढ्य परिवारों को पहली पसंद बने हुए हैं.

4. राज्‍य सरकार गिराने के लिए धारा 356 को छुआ तक नहीं, इस सद्भाव ने राज्‍यों का दिल जीत लिया : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शक्तिशाली छवि और नेतृत्व ने भारत की राजनीति को नया आकार दिया है. उनकी दृढ़ता, नीतिगत सुधार, और वैश्विक प्रभाव ने उन्हें अपार शक्ति दी, लेकिन साथ ही उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई. विपक्ष के लोकतंत्र को कमजोर करने के आरोपों के बावजूद, मोदी ने कभी किसी राज्य सरकार को बर्खास्त करने या लोकतांत्रिक अधिकारों को कम करने की प्रत्यक्ष कोशिश नहीं की. मोदी ने अपने कार्यकाल में अभूतपूर्व शक्ति अर्जित की. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी को पूर्ण बहुमत (282 और 303 सीटें) मिला, जो भारत में गैर-कांग्रेसी नेतृत्व के लिए ऐतिहासिक था.

मोदी की यह शक्ति केंद्र सरकार की नीतियों, आरएसएस के समर्थन, और उनकी करिश्माई छवि से उपजी. लेकिन यह शक्ति लोकतांत्रिक ढांचे में संतुलित रही, क्योंकि उन्होंने संवैधानिक सीमाओं का पालन किया. मोदी ने कभी किसी राज्य सरकार को बर्खास्त करने की कोशिश नहीं की. संविधान के अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का उपयोग उनके कार्यकाल में न्यूनतम रहा.

उदाहरण स्वरूप, 2014-2025 में केवल जम्मू-कश्मीर (2018-2019, गवर्नर शासन) और महाराष्ट्र (2019, संक्षिप्त अवधि) में राष्ट्रपति शासन लगा, लेकिन यह संवैधानिक प्रक्रिया के तहत था, न कि मनमाने ढंग से. तुलनात्मक रूप से, इंदिरा गांधी के शासन में 50 बार अनुच्छेद 356 का उपयोग हुआ. यही कारण रहा कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ कभी एंटी इंकंबेंसी नहीं पैदा हुई.

5. दृढ़ फैसले लेने में कोई जोड़ नहीं, इसी के चलते नारा बुलंद हुआ ‘मोदी है तो मुमकिन है’ : मोदी का करिश्मा सबसे पहले उनकी दृढ़ता और उनके फैसले में दिखता है. वे एक ऐसे नेता के रूप में देखे जाते हैं जो कठिन फैसले लेने से नहीं हिचकते. उनके हर दृढ़ फैसले पर उनके समर्थक यह दोहराते नहीं थकते कि ‘मोदी है तो मुमकिन है’. 2016 की नोटबंदी, 2019 में धारा 370 को खत्म करना, 2020 में कोविड-19 महामारी में लॉकडाउन जैसे कदम, चाहे विवादास्पद रहे हों पर इतना तो सत्य है कि उनकी ‘मजबूत इच्छाशक्ति’ और दृढ़ फैसले लेने वाले की उनकी छवि बनाई. सर्जिकल स्ट्राइक (2016), बालाकोट एयर स्ट्राइक (2019) और ऑपरेशन सिंदूर (2025) ने पाकिस्तान के खिलाफ ‘कड़ी कार्रवाई’ का संदेश दिया, जो हिंदू राष्ट्रवादी आधार को मजबूत किया. इस दृढ़ता का प्रभाव आंकड़ों में दिखता है. मोदी सरकार ने रक्षा बजट को 2014 के 2.5 लाख करोड़ से बढ़ाकर 2025 में 6.2 लाख करोड़ कर दिया. यही कारण रहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास तेजी से हुआ. यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज भी चुनावी राजनीति में अजेय बने हुए हैं.

6. जहां पीछे हटना पड़ा, वहां गरिमामयी ढंग से पीछे हटे भी, सत्‍ता के मद में नहीं रहे : मोदी ने कभी अपनी जिद पर अड़े रहकर पार्टी का नुकसान नहीं होने दिया. किसानों ने जब दिल्ली घेर लिया था तो भी सत्ता के मद में चूर हो कर उसे कुचलने का प्रयास नहीं किया. उन्हें बहुत गरिमामयी तरीके से किसान बिलों को वापस ले लिया. जीएसटी दरों को कम करना भी उसी कड़ी का एक हिस्सा है. पार्लियामेंट में पेश होने वाले बिलों को विपक्ष के मांग के अनुसार जेपीसी में भेजना रहा हो. या पूर्ण बहुमत मिलने के बाद भी अपने सहयोगियों को बराबर का महत्व देना ऐसी ही बातें हैं जो उन्हें भारतीय राजनीति में अजेय बना देती हैं.

7. और सबसे अंत में लेकिन, सबसे बड़ी ताकत- ईमानदारी (न खाऊंगा, न खाने दूंगा) : प्रधानमंत्री मोदी के सत्‍ता संभालने से पहले भारतीय राजनीति लंबे अरसे तक नेताओं के भ्रष्‍टाचार और परिवारवाद से ग्रसित रही. जब मोदी गुजरात से केंद्र की राजनीति में आए, तो उनका यही पहलू उजागर हुआ कि वे भ्रष्‍टाचार-मुक्‍त सरकार चलाना जानते हैं. उनकी इस कर्मठता का असर सिस्‍टम पर दिखा भी. मंत्रालयों से भ्रष्‍टाचार की खबरें आना बंद हो गईं. हां, विपक्ष ने बीच बीच में मोदी पर राफेल डील और अडानी के बहाने भ्रष्‍टाचार का आरोप लगाने की कोशिश की, लेकिन ये आरोप चुनावों में जनता के गले नहीं उतरे. आज भी जब देश में लगभग सभी बड़ी पार्टियां किसी न किसी तरह के परिवारवाद में डूबी हैं, प्रधानमंत्री मोदी ने खुद को परिवार और रिश्‍तेदारों से दूर रखकर यह मैसेज दिया है कि देश का शीर्ष नेतृत्‍व ‘भाई-भतीजावाद’ में विश्‍वास नहीं रखता है. मोदी की यह ताकत उनके पक्ष में साइलेंट वोटर का बड़ा वर्ग खड़ा कर देती है.

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साल 1971 में अपने पहले दिल्ली दौरे के दौरान नरेंद्र मोदी की तस्वीर

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1988 में नरेंद्र मोदी ने कैलाश मानसरोवर की यात्रा की थी. इसके बारे में काफी कम लोगों को पता है.

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तस्वीर में नरेंद्र मोदी फिल्म अभिनेता मनोज कुमार के साथ एक मंच पर दिखाई दे रहे हैं. यह तस्वीर 1984 की है.

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यह तस्वीर 1998 के उनके मॉरिशस यात्रा की है. वह वहां गंगा तालाब के किनारे खड़े हैं.

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मुरली मनोहर जोशी के साथ नरेंद्र मोदी की तस्वीर

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