कोलकाता/बागुईहाटी, 10 सितंबर:
पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा अब केवल भव्यता और सजावट का नाम नहीं रह गई है, बल्कि समाज को गहरी सोच देने का माध्यम बन चुकी है। इसी कड़ी में बागुईहाटी रेल पुकुर यूनाइटेड क्लब अपने 72वें वर्ष में पर्यावरण और प्रकृति की लुप्त होती ध्वनियों को जीवंत करने के लिए ‘शब्दो’ (ध्वनि) थीम लेकर आया है।
इस थीम के माध्यम से क्लब ने उस हकीकत को दिखाने की कोशिश की है जो शहरीकरण की दौड़ में पीछे छूटती जा रही है — पक्षियों की चहचहाहट, उल्लुओं की आवाज़ और प्रकृति के वो संगीत जो कभी हमारे जीवन का हिस्सा हुआ करते थे।
20 फीट ऊंचा पक्षी और जीवंत ध्वनि परिदृश्य
पूजा मंडप में 20 फीट ऊंचे पक्षी की आकर्षक कलाकृति लगाई जाएगी जो प्रकृति की भव्यता और हमारे जीवन से उसकी दूरी का प्रतीक होगी। मंडप में अलग-अलग ध्वनि परिदृश्यों के साथ पक्षियों की खामोश चीखों और उनकी मौन विनती को दर्शाने के लिए माइम परफॉर्मेंस, लाइट व साउंड शो और नाट्य प्रस्तुति भी की जाएगी।
थीम के पीछे का संदेश
क्लब का उद्देश्य है कि शहरीकरण, पेड़ों की कटाई और कंक्रीट के जंगलों ने किस तरह पक्षियों और प्राकृतिक ध्वनियों को हमसे छीन लिया है। यह थीम लोगों को यह सोचने पर मजबूर करेगी कि अगर अभी भी हम प्रकृति को बचाने के लिए नहीं जागे तो आने वाली पीढ़ियां मौन दुनिया में जीने को मजबूर होंगी।
कलाकारों की पूरी टीम
थीम की संकल्पना और कलात्मक डिज़ाइन सोमनाथ तामली ने तैयार किया है, जबकि देवी की मूर्ति देबप्रसाद हाजरा बना रहे हैं। प्रकाश और छाया के नाटक की जिम्मेदारी दीपांकर दे संभाल रहे हैं। माइम व ध्वनि प्रस्तुति शुभेंदु मुखोपाध्याय और कौशिक बिस्वास देंगे। पंडाल निर्माण बापी दास की देखरेख में हो रहा है और छायांकन व संपादन समीरन जाना कर रहे हैं। रिसर्च व डिज़ाइन सपोर्ट पौलमी बोस, फारुख शेख और देबयान बनर्जी ने दिया है।
समिति की अपील
क्लब के सदस्य गौरव बिस्वास ने कहा, “हमारा थीम ‘शब्दो’ महज़ सजावट नहीं, बल्कि एक संदेश है। प्रकृति की ध्वनियां केवल बैकग्राउंड म्यूज़िक नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण की धड़कन हैं। हमें यह सोचने की ज़रूरत है कि कहीं कल की दुनिया खामोश न हो जाए।”
दुर्गोत्सव में सामाजिक चेतना
बागुईहाटी रेल पुकुर यूनाइटेड क्लब ने पिछले कई वर्षों में अपनी थीम आधारित पूजा के लिए पहचान बनाई है। इस बार ‘शब्दो’ थीम के साथ क्लब न केवल पूजा के भव्य आयोजन कर रहा है, बल्कि समाज को यह भी सिखा रहा है कि परंपरा, पूजा और पर्यावरणीय जागरूकता का संगम ही हमारी आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य देगा।











