कोलकाता, बिकाश चंद्र, सिटी टुडे न्यूज़: पश्चिम बंगाल के स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों और उनके अभिभावकों के लिए शिक्षा व्यवस्था से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने स्कूलों में पास-फेल व्यवस्था दोबारा शुरू करने की आवश्यकता पर अपनी राय रखी है। उन्होंने कहा कि इस संबंध में अंतिम फैसला पाठ्यक्रम समिति की सिफारिशों और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप लिया जाएगा। मुख्यमंत्री ने स्कूलों में मोबाइल फोन पर प्रतिबंध लगाने, भारतीय और पश्चिम बंगाल के इतिहास को पढ़ाई में महत्व देने तथा ब्रतचारी, राष्ट्रीय सेवा योजना और राष्ट्रीय कैडेट कोर जैसी गतिविधियों को फिर से बढ़ावा देने की भी वकालत की है।
क्या स्कूलों में फिर शुरू होगी पास-फेल व्यवस्था?
पश्चिम बंगाल के स्कूलों में पास-फेल व्यवस्था की वापसी को लेकर लंबे समय से चर्चा होती रही है। इसी मुद्दे पर सवाल पूछे जाने पर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि राज्य सरकार पाठ्यक्रम समिति की सिफारिशों का पालन करेगी। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति का उल्लेख करते हुए कहा कि संबंधित रिपोर्ट आने तक इंतजार करना चाहिए।
मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि शिक्षा विभाग में अनुभवी और शिक्षित लोग हैं, इसलिए उन्हें विचार-विमर्श के बाद निर्णय लेने का अवसर दिया जाना चाहिए। हालांकि, उन्होंने अपनी व्यक्तिगत राय स्पष्ट करते हुए कहा कि स्कूलों में पास-फेल व्यवस्था दोबारा लागू करने की जरूरत है।
इस बयान के बाद विद्यार्थियों, अभिभावकों और शिक्षकों के बीच यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि नई व्यवस्था किस कक्षा से लागू हो सकती है और इसके लिए क्या नियम बनाए जाएंगे। फिलहाल सरकार की ओर से अंतिम निर्णय की घोषणा नहीं हुई है।
आठवीं कक्षा तक पास-फेल व्यवस्था का क्या है इतिहास?
पश्चिम बंगाल में वर्ष 2010 में आठवीं कक्षा तक विद्यार्थियों को अनुत्तीर्ण नहीं करने की नीति अपनाई गई थी। यह कदम उस समय शिक्षा के अधिकार कानून के तहत लागू नो-डिटेंशन नीति के अनुरूप था। इस व्यवस्था के तहत विद्यार्थियों को अगली कक्षा में भेजने पर जोर दिया जाता था, ताकि परीक्षा में असफल होने के कारण उनकी पढ़ाई बीच में न छूटे।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में पांचवीं और आठवीं कक्षा के विद्यार्थियों के मूल्यांकन तथा आवश्यक परिस्थितियों में दोबारा कक्षा में पढ़ने से संबंधित प्रावधानों की गुंजाइश है। हालांकि, इन प्रावधानों को राज्य में किस तरह लागू किया जाएगा, यह राज्य सरकार के फैसले और संबंधित नियमों पर निर्भर करेगा।
पास-फेल व्यवस्था की वापसी पर विचार करते समय विद्यार्थियों की सीखने की क्षमता, कमजोर विषयों में सुधार और स्कूल छोड़ने की आशंका जैसे पहलुओं पर ध्यान देना भी जरूरी होगा।
स्कूलों में मोबाइल फोन पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने स्कूलों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने की भी वकालत की है। उनकी व्यक्तिगत राय है कि विद्यार्थियों को स्कूल के समय पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए और मोबाइल फोन के अनावश्यक इस्तेमाल को सीमित किया जाना चाहिए।
आज मोबाइल फोन विद्यार्थियों के लिए जानकारी प्राप्त करने और डिजिटल अध्ययन का माध्यम भी है। वहीं, पढ़ाई के दौरान लगातार सूचनाएं, खेल और सामाजिक माध्यमों का इस्तेमाल ध्यान भटका सकता है। ऐसे में मोबाइल फोन के इस्तेमाल को लेकर स्पष्ट नियम बनाने पर विचार किया जा सकता है।
हालांकि, मुख्यमंत्री की राय सामने आने के बावजूद स्कूलों में मोबाइल फोन पर प्रतिबंध से संबंधित अंतिम सरकारी आदेश और उसके विस्तृत नियमों की घोषणा अभी नहीं हुई है। यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि भविष्य में किसी प्रतिबंध के साथ शैक्षणिक उपयोग के लिए क्या छूट दी जाएगी।
भारतीय और पश्चिम बंगाल के इतिहास पर जोर
मुख्यमंत्री ने विद्यार्थियों को भारत और पश्चिम बंगाल के इतिहास से बेहतर तरीके से परिचित कराने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि आधुनिक विषयों के साथ विद्यार्थियों को देश के इतिहास और राज्य की ऐतिहासिक विरासत के बारे में भी पढ़ाया जाना चाहिए।
इतिहास की पढ़ाई से विद्यार्थियों को विभिन्न कालखंडों, सामाजिक बदलावों, सांस्कृतिक परंपराओं और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को समझने का अवसर मिलता है। पाठ्यक्रम में किसी भी बदलाव के दौरान तथ्यात्मक जानकारी, ऐतिहासिक स्रोतों और संतुलित प्रस्तुति का महत्व बना रहता है।
इस दिशा में पाठ्यक्रम समिति की भूमिका महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि उसी की सिफारिशों के आधार पर विषयों और पाठ्यपुस्तकों में संभावित बदलावों पर विचार किया जा सकता है।
ब्रतचारी, एनएसएस और एनसीसी को फिर बढ़ावा देने की बात
मुख्यमंत्री ने स्कूलों में ब्रतचारी गतिविधियों, राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस) और राष्ट्रीय कैडेट कोर (एनसीसी) को फिर से बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। इन गतिविधियों का उद्देश्य विद्यार्थियों में अनुशासन, शारीरिक सक्रियता, सामाजिक जिम्मेदारी और सामूहिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना हो सकता है।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि स्कूलों में केवल पाठ्यपुस्तकों तक शिक्षा सीमित नहीं रहनी चाहिए। विद्यार्थियों को ऐसी गतिविधियों में हिस्सा लेने के अवसर मिलने चाहिए, जिनसे उनके व्यक्तित्व का व्यापक विकास हो सके।
संगीत, वाद्ययंत्र और प्रतियोगिताओं को मिलेगा महत्व?
मुख्यमंत्री ने प्राथमिक स्तर से ही संगीत और सांस्कृतिक शिक्षा को प्रोत्साहित करने की बात कही। उन्होंने तबला, हारमोनियम, गिटार, सितार, मृदंग और खंजनी जैसे वाद्ययंत्रों से विद्यार्थियों को परिचित कराने का सुझाव दिया।
इसके अलावा, उन्होंने हर वर्ष कम से कम तीन दिन वाद-विवाद, प्रश्नोत्तरी और तात्कालिक भाषण जैसी प्रतियोगिताएं आयोजित करने की राय रखी। ऐसी गतिविधियों से विद्यार्थियों को अपनी बात रखने, विषयों पर विचार करने और मंच पर बोलने का अभ्यास मिल सकता है।
अगले शैक्षणिक सत्र पर नजर
मुख्यमंत्री के बयान से संकेत मिलता है कि पश्चिम बंगाल की स्कूल शिक्षा व्यवस्था में बदलाव पर विचार किया जा रहा है। हालांकि, पास-फेल व्यवस्था, मोबाइल फोन के इस्तेमाल और पाठ्यक्रम में संशोधन को लेकर अंतिम निर्णय संबंधित समिति की सिफारिशों तथा सरकार की आधिकारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगा।
फिलहाल विद्यार्थियों और अभिभावकों को आधिकारिक आदेश का इंतजार करना चाहिए। पास-फेल व्यवस्था की वापसी का संकेत जरूर मिला है, लेकिन इसे लागू करने की कक्षा, तारीख और नियम अभी तय होने बाकी हैं।




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