नई दिल्ली, बिकाश चंद्र, सिटी टुडे न्यूज़ : भारत के निर्वाचन आयोग में वरिष्ठ अधिकारियों के बीच कामकाज के बंटवारे को लेकर उठे सवाल अब चर्चा में हैं। पीटीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार, सूचना का अधिकार कानून के तहत प्राप्त दस्तावेजों से पता चला है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह सान्धू और विवेक जोशी ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के कामकाज को लेकर अलग-अलग पत्र लिखे थे। इन पत्रों में अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों के बंटवारे की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे। दस्तावेजों से यह भी सामने आया है कि कैबिनेट सचिवालय को दोनों पत्र मिले थे, लेकिन उसने इस मामले में कार्रवाई नहीं की। इसके पीछे औपचारिक शिकायत और संस्थागत संवाद से जुड़ी वजह बताई गई।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि निर्वाचन आयोग देश में चुनाव प्रक्रिया के संचालन और उसकी निगरानी के लिए जिम्मेदार संवैधानिक संस्था है। ऐसे में आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच कामकाज के बंटवारे और प्रशासनिक प्रक्रिया को लेकर उठने वाले सवालों पर स्वाभाविक रूप से ध्यान जाता है।
आरटीआई से सामने आई पत्राचार की जानकारी
पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले से संबंधित जानकारी सूचना का अधिकार कानून के तहत प्राप्त दस्तावेजों से सामने आई। यह आरटीआई कमोडोर लोकेश के. बत्रा ने दाखिल की थी। दस्तावेजों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह सान्धू और विवेक जोशी की ओर से लिखे गए अलग-अलग पत्रों का उल्लेख है।
इन पत्रों में वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के कामकाज को लेकर सवाल उठाए गए थे। रिपोर्ट के अनुसार, विवाद का प्रमुख मुद्दा वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त, महानिदेशक और समान स्तर के अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा था।
दस्तावेजों में सामने आई जानकारी के अनुसार, मनीष गर्ग ने चुनाव आयुक्तों के साथ चर्चा किए बिना इन अधिकारियों के बीच काम का बंटवारा कर दिया था। इसी प्रक्रिया को लेकर दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग पत्र लिखे थे।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर इन पत्रों में उठाए गए सवालों को आरोपों और प्रशासनिक आपत्तियों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। इनका उल्लेख अपने आप में किसी अधिकारी की गलती या नियमों के उल्लंघन का अंतिम प्रमाण नहीं है।
अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों के बंटवारे पर क्या था सवाल?
इस मामले का केंद्र वरिष्ठ अधिकारियों के बीच कामकाज की जिम्मेदारियों का निर्धारण है। किसी बड़े संस्थान में विभिन्न अधिकारियों के बीच कार्यों का बंटवारा प्रशासनिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इससे यह तय होता है कि कौन अधिकारी किस विषय या विभाग की जिम्मेदारी संभालेगा और किस स्तर पर निर्णय लिए जाएंगे।
पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, मनीष गर्ग ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त, महानिदेशक और समान स्तर के अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा चुनाव आयुक्तों के साथ चर्चा किए बिना किया था। इस प्रक्रिया को लेकर सुखबीर सिंह सान्धू और विवेक जोशी ने अपनी आपत्तियां पत्रों के माध्यम से दर्ज कराई थीं।
यहां मुख्य सवाल केवल जिम्मेदारियों के बंटवारे का नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया का भी है जिसके तहत वरिष्ठ अधिकारियों के कार्यक्षेत्र निर्धारित किए गए। हालांकि, उपलब्ध दस्तावेजों के विवरण से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि संबंधित व्यवस्था के पीछे क्या प्रशासनिक तर्क था या इस पर निर्वाचन आयोग के भीतर कोई अन्य निर्णय लिया गया था।
कैबिनेट सचिवालय ने कार्रवाई क्यों नहीं की?
इस मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू कैबिनेट सचिवालय की भूमिका है। आरटीआई से प्राप्त जानकारी के अनुसार, सचिवालय ने दोनों चुनाव आयुक्तों की ओर से भेजे गए पत्रों पर कार्रवाई नहीं की। दस्तावेजों में इसके पीछे औपचारिक शिकायत नहीं मिलने की वजह बताई गई।
सचिवालय का कहना था कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने व्यक्तिगत रूप से शिकायत की थी। निर्वाचन आयोग की ओर से इस विषय पर कोई औपचारिक शिकायत नहीं भेजी गई थी। ऐसे में सचिवालय के अनुसार, बिना संस्थागत स्तर पर औपचारिक संवाद के कार्रवाई करना आयोग के कामकाज में हस्तक्षेप माना जा सकता था।
इस स्पष्टीकरण से प्रशासनिक प्रक्रिया और संस्थागत अधिकारों के बीच संतुलन का प्रश्न सामने आता है। किसी अधिकारी की ओर से व्यक्तिगत रूप से उठाई गई आपत्ति और किसी संस्था की ओर से औपचारिक शिकायत भेजे जाने की स्थिति प्रशासनिक दृष्टि से अलग हो सकती है।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी यह स्पष्ट नहीं करती कि कैबिनेट सचिवालय ने इन पत्रों पर किसी अन्य स्तर पर विचार किया था या नहीं। इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि शिकायतों पर कोई भी विचार नहीं हुआ; दस्तावेजों के अनुसार, उन पर औपचारिक कार्रवाई नहीं की गई।
दोनों पत्र मिलने की पुष्टि हुई
आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, कैबिनेट सचिवालय ने दोनों पत्रों की प्राप्ति की पुष्टि की थी। यानी पत्र सचिवालय तक पहुंचे थे और उनकी प्राप्ति को स्वीकार किया गया था।
दस्तावेजों के अनुसार, इनमें से एक पत्र की प्रति मुख्य चुनाव आयुक्त के प्रधान सचिव को भी भेजी गई थी। साथ ही, संबंधित वरिष्ठ अधिकारी के बारे में भविष्य में निर्णय लेते समय इस मामले पर विचार करने का उल्लेख किया गया था।
यह विवरण बताता है कि पत्रों की प्राप्ति दर्ज की गई थी और संबंधित अधिकारी के विषय में भविष्य में निर्णय लेने के संदर्भ में मामले का उल्लेख हुआ था। लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि बाद में संबंधित अधिकारी के संबंध में कोई विशेष निर्णय लिया गया या शिकायतों के आधार पर कोई कार्रवाई हुई।
प्रशासनिक पारदर्शिता पर फिर चर्चा
इस पूरे मामले में सूचना का अधिकार कानून की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। आरटीआई के जरिए प्राप्त दस्तावेजों ने ऐसे पत्राचार का विवरण सार्वजनिक किया, जो अन्यथा व्यापक चर्चा में नहीं आ सकता था। इससे सरकारी संस्थानों में निर्णय लेने की प्रक्रिया, जिम्मेदारियों के निर्धारण और शिकायतों पर कार्रवाई के तरीके को समझने का अवसर मिलता है।
फिलहाल, पीटीआई की रिपोर्ट और आरटीआई दस्तावेजों के आधार पर इतना स्पष्ट है कि दो चुनाव आयुक्तों ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग के कामकाज और अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों के बंटवारे को लेकर अलग-अलग पत्र लिखे थे। कैबिनेट सचिवालय ने पत्र मिलने की पुष्टि की, लेकिन औपचारिक शिकायत नहीं होने के कारण कार्रवाई नहीं की।
इस मामले में आगे किसी संस्थागत प्रतिक्रिया या अतिरिक्त दस्तावेज के सामने आने पर ही पूरे घटनाक्रम की अधिक स्पष्ट तस्वीर सामने आ सकेगी।




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