आसनसोल: आसनसोल के मोहिशिला क्षेत्र से एक मां की ऐसी मार्मिक अपील सामने आई है, जिसने दिव्यांग मरीजों और उनके परिवारों के सामने आने वाली कठिनाइयों को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। मोहिशिला की रहने वाली जयश्री भट्टाचार्य ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से हाथ जोड़कर मदद की गुहार लगाई है। उनका कहना है कि उनकी बेटी पूरी तरह दिव्यांग है और उसे इलाज के लिए अस्पताल ले जाना तथा वहां से वापस घर लाना उनके लिए बेहद कठिन होता जा रहा है।
जयश्री भट्टाचार्य के अनुसार, कई वर्ष पहले उनके पति का निधन हो गया था। उनके पति पेशे से इंजीनियर थे। पति के निधन के बाद परिवार की जिम्मेदारी काफी हद तक उनके कंधों पर आ गई। अब उनकी दिव्यांग बेटी की देखभाल, उसकी दैनिक जरूरतें और चिकित्सा संबंधी जिम्मेदारियां भी उन्हें अकेले ही संभालनी पड़ रही हैं। बेटी की शारीरिक स्थिति ऐसी है कि उसे सामान्य मरीजों की तरह आसानी से अस्पताल ले जाना संभव नहीं है।
उन्होंने बताया कि बेटी को चिकित्सा सुविधा दिलाने के लिए अस्पताल जाना पड़ता है, लेकिन उसे घर से बाहर निकालकर वाहन के माध्यम से अस्पताल तक पहुंचाना अपने आप में एक बड़ी चुनौती बन जाता है। अस्पताल पहुंचने के बाद इलाज की प्रक्रिया पूरी होने और फिर बेटी को वापस घर लाने में भी काफी परेशानी होती है। ऐसी स्थिति में बार-बार अस्पताल जाने की मजबूरी उनके लिए शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से कठिन साबित हो रही है।
जयश्री भट्टाचार्य ने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से भावुक अपील करते हुए कहा कि यदि सरकार ऐसी व्यवस्था कर सके, जिसके तहत पूरी तरह दिव्यांग और गंभीर रूप से चलने-फिरने में असमर्थ मरीजों की जांच के लिए सरकारी चिकित्सक उनके घर तक पहुंचें, तो इससे उनके जैसे परिवारों को बड़ी राहत मिल सकती है।
उनकी मांग केवल अपनी बेटी तक सीमित नहीं है। जयश्री भट्टाचार्य का कहना है कि राज्य में ऐसे अनेक परिवार हो सकते हैं, जहां गंभीर रूप से दिव्यांग या बिस्तर पर रहने वाले मरीज हैं। ऐसे मरीजों को हर छोटी-बड़ी चिकित्सा आवश्यकता के लिए अस्पताल तक ले जाना उनके परिजनों के लिए बेहद मुश्किल होता है। कई बार परिवार में केवल एक व्यक्ति ही मरीज की देखभाल करता है। ऐसे में अस्पताल तक पहुंचाना और वापस लाना किसी चुनौती से कम नहीं होता।
जयश्री ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि सरकार इस समस्या को गंभीरता से ले और पूरी तरह दिव्यांग मरीजों के लिए घर पर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने की दिशा में ठोस कदम उठाए। उन्होंने मांग की कि यदि इसके लिए किसी नए कानून या सरकारी व्यवस्था की आवश्यकता है, तो विधानसभा में विधेयक लाकर ऐसी व्यवस्था को कानूनी रूप दिया जाए।
उनका कहना है कि यदि सरकारी चिकित्सकों की एक विशेष टीम ऐसे मरीजों के घर जाकर उनकी प्राथमिक जांच कर सके, आवश्यक दवाओं के बारे में सलाह दे सके और जरूरत पड़ने पर उन्हें अस्पताल रेफर कर सके, तो इससे मरीजों के साथ-साथ उनके परिवारों को भी काफी राहत मिलेगी। गंभीर स्थिति होने पर चिकित्सक यह भी तय कर सकते हैं कि मरीज को अस्पताल में भर्ती कराने की आवश्यकता है या घर पर ही उसकी देखभाल जारी रखी जा सकती है।
मोहिशिला की इस घटना ने घर पर चिकित्सा सुविधा की जरूरत को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा किया है। चिकित्सा व्यवस्था का उद्देश्य केवल अस्पतालों में उपचार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उन लोगों तक भी स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाना होना चाहिए, जो शारीरिक स्थिति के कारण अस्पताल तक आसानी से नहीं पहुंच सकते। विशेष रूप से ऐसे मरीज, जो पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हैं, उनके लिए घर पर चिकित्सकीय परामर्श काफी उपयोगी साबित हो सकता है।
दिव्यांग मरीजों के परिवारों के सामने केवल चिकित्सा की समस्या नहीं होती। उन्हें मरीज को उठाने, वाहन की व्यवस्था करने, अस्पताल की सीढ़ियों या गलियारों से ले जाने, जांच के दौरान उसे संभालने और फिर वापस घर पहुंचाने जैसी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। यदि परिवार में बुजुर्ग सदस्य हों या आर्थिक स्थिति कमजोर हो, तो यह परेशानी और भी बढ़ जाती है।
जयश्री भट्टाचार्य की अपील ऐसे ही परिवारों की आवाज बनकर सामने आई है। उन्होंने मुख्यमंत्री से उम्मीद जताई है कि सरकार उनकी व्यक्तिगत समस्या को सुनने के साथ-साथ इस मुद्दे को व्यापक स्तर पर भी देखेगी। उनका कहना है कि यदि घर पर चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध कराने के लिए कोई प्रभावी सरकारी योजना शुरू होती है, तो इससे हजारों जरूरतमंद मरीजों और उनके परिवारों को लाभ मिल सकता है।
उन्होंने मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी से विशेष रूप से आग्रह किया कि इस विषय को विधानसभा में उठाया जाए और आवश्यक होने पर विधायी प्रक्रिया के माध्यम से ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिससे गंभीर रूप से दिव्यांग मरीजों को उनके घर पर ही प्राथमिक चिकित्सा और चिकित्सकीय परामर्श मिल सके।
जयश्री की इस मांग के पीछे एक मां की व्यक्तिगत पीड़ा के साथ-साथ एक व्यापक सामाजिक समस्या भी दिखाई देती है। जब कोई परिवार लंबे समय तक किसी दिव्यांग सदस्य की देखभाल करता है, तो उसके सामने चिकित्सा सुविधा तक पहुंच सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन जाती है। ऐसे में घर तक स्वास्थ्य सेवा पहुंचाने की व्यवस्था उनके लिए काफी महत्वपूर्ण हो सकती है।
फिलहाल जयश्री भट्टाचार्य को उम्मीद है कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी उनकी अपील पर संवेदनशीलता से विचार करेंगे और उनकी दिव्यांग बेटी के इलाज के लिए कोई व्यावहारिक समाधान निकलेगा। उनकी मांग है कि केवल उनकी बेटी ही नहीं, बल्कि राज्य के उन सभी दिव्यांग और बिस्तर पर रहने वाले मरीजों के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई जाए, जिन्हें अस्पताल तक पहुंचना बेहद कठिन होता है।
एक मां की यह गुहार अब सरकारी व्यवस्था से जवाब की उम्मीद कर रही है। सवाल सिर्फ एक परिवार की परेशानी का नहीं, बल्कि उन तमाम परिवारों का है जो अपने घरों में गंभीर रूप से दिव्यांग मरीजों की देखभाल करते हुए हर दिन इसी तरह की कठिनाइयों से गुजरते हैं। यदि घर तक चिकित्सा सेवा पहुंचाने की प्रभावी व्यवस्था तैयार होती है, तो यह ऐसे परिवारों के लिए बड़ी राहत साबित हो सकती है।




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