आसनसोल: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय “चोप-घुगनी” सिर्फ एक खाने की चीज नहीं, बल्कि एक बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है। जहां एक तरफ इस पेशे को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है, वहीं कुल्टी के मिठानी गांव के मेले में एक ऐसा दृश्य सामने आया जिसने पूरी बहस का रुख बदल दिया।
तृणमूल कांग्रेस के प्रत्याशी अभिजीत घटक ने न सिर्फ घुगनी खाकर लोगों के बीच संदेश दिया, बल्कि इस काम को “कला” का दर्जा देकर गरीब और मेहनतकश वर्ग के सम्मान की बात भी उठाई।
⚡ पृष्ठभूमि: ‘मजाक’ बनाम ‘सम्मान’ की सियासत
हाल ही में आसनसोल दक्षिण से बीजेपी प्रत्याशी अग्निमित्रा पॉल पर चुनाव प्रचार के दौरान चोप तलने को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। विपक्ष का आरोप था कि यह गरीबों के रोजगार का मजाक उड़ाने जैसा है।
इसी विवाद के बीच अभिजीत घटक ने पूरी रणनीति ही बदल दी। उन्होंने उसी “चोप-घुगनी” को सम्मान देने का संदेश देकर सियासी माहौल में नया मोड़ ला दिया।
🎡 मिठानी मेले में चुनावी रणनीति
मिठानी गांव में रामकृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर आयोजित 24 प्रहर हरिनाम संकीर्तन और सात दिवसीय सांस्कृतिक कार्यक्रम के साथ लगा ग्रामीण मेला इस बार राजनीतिक रंग में भी रंगा नजर आया।
इस मौके का फायदा उठाते हुए अभिजीत घटक ने—
- मेले की हर दुकान पर जाकर लोगों से संपर्क किया
- मनिहारी, खिलौने और खाने-पीने की दुकानों पर पहुंचे
- आम लोगों के साथ सेल्फी और बातचीत की
- कार्यकर्ताओं के साथ घुगनी खाकर सादगी का संदेश दिया
यानी, उन्होंने एक ही समय में उत्सव का आनंद भी लिया और चुनावी प्रचार भी—ठीक वैसे ही जैसे कहावत है, “एक पंथ, दो काज”।
🍛 ‘घुगनी’ बना सम्मान और रोजगार का प्रतीक
मेले में घुगनी खाते हुए अभिजीत घटक ने कहा:
“चोप, घुगनी और फुचका सिर्फ खाने की चीज नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका का साधन है। इसे मजाक नहीं, सम्मान मिलना चाहिए।”
उनका यह बयान सीधे तौर पर गरीब और मेहनतकश वर्ग के साथ जुड़ने की कोशिश माना जा रहा है।
🗳️ राजनीति का नया फॉर्मूला: भावनाएं + रोजगार
तृणमूल कांग्रेस लंबे समय से मेलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए जनता से जुड़ने की रणनीति अपनाती रही है। कुल्टी का यह मेला भी उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जहां—
- स्थानीय भावनाओं को महत्व दिया गया
- छोटे व्यवसायों को सम्मान देने का संदेश दिया गया
- और जमीनी स्तर पर वोट बैंक मजबूत करने की कोशिश की गई
🔍 विश्लेषण: क्या बदलेगा चुनावी समीकरण?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस तरह की “सॉफ्ट पॉलिटिक्स” सीधे आम जनता के दिल पर असर डालती है। जहां एक तरफ विरोधी “मजाक” का आरोप झेल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अभिजीत घटक “सम्मान” की राजनीति कर रहे हैं।
अब देखना दिलचस्प होगा कि चोप-घुगनी की यह सियासत वोटों में कितना असर दिखाती है।
👉 कुल मिलाकर, कुल्टी का यह मेला सिर्फ एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि यह साबित कर गया कि राजनीति में अब हर छोटा मुद्दा भी बड़ा चुनावी हथियार बन सकता है।














