पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के बीच एक बड़ा प्रशासनिक अपडेट सामने आया है। मृत, अनुपस्थित और लापता मतदाताओं के रूप में पहले ही 58 लाख लोगों की पहचान कर उनके नाम प्रारूप सूची से हटाए जा चुके थे। अब सुनवाई चरण के दौरान लगभग 10 लाख और मतदाताओं की पहचान की गई है, जिनके नाम अंतिम सूची से हटाए जाने की संभावना जताई जा रही है।
माइक्रो ऑब्जर्वरों की रिपोर्ट से बढ़ी चिंता
सूत्रों के अनुसार, आयोग द्वारा नियुक्त माइक्रो ऑब्जर्वरों ने चार लाख से अधिक मतदाताओं के दस्तावेज़ों को ‘अयोग्य’ के रूप में चिन्हित किया है। कुल 4 लाख 44 हजार 970 दस्तावेज़ों को अयोग्य करार देते हुए इसकी विस्तृत रिपोर्ट पहले ही चुनाव आयोग को भेज दी गई है।
साथ ही, लगभग 30 लाख मतदाताओं के दस्तावेज़ पुनः जांच के लिए इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (ईआरओ) और सहायक इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर (एईआरओ) के पास भेजे गए हैं।
अब भी लाखों दस्तावेज़ लंबित, सत्यापन बना बड़ी चुनौती
जिला अधिकारियों के पास अभी भी 4 लाख 66 हजार 323 दस्तावेज़ लंबित पड़े हैं, जिनका सत्यापन बाकी है। इसके अलावा, आयोग के सूत्रों का कहना है कि करीब 20 लाख मतदाताओं के दस्तावेज़ों पर अब तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया जा सका है।
अधिकारियों के अनुसार, सभी लंबित दस्तावेज़ों की जांच पूरी होने के बाद ही अंतिम निष्कर्ष निकाला जाएगा।
सुनवाई में नहीं पहुंचे लाखों मतदाता
एसआईआर सुनवाई प्रक्रिया के दौरान लगभग 7 लाख मतदाता उपस्थित नहीं हुए। ऐसे मामलों में उनके दस्तावेज़ों की पुष्टि नहीं हो पाई, जिससे उनके नाम हटने की संभावना और बढ़ गई है। वहीं, शेष कई मामलों में दस्तावेज़ आयोग की निर्धारित सूची के अनुरूप नहीं पाए गए।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और 28 फरवरी की डेडलाइन
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद चुनाव आयोग ने 28 फरवरी को पश्चिम बंगाल की अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने की घोषणा की है। हालांकि, दस्तावेज़ सत्यापन की अंतिम समय-सीमा 21 फरवरी तय की गई है।
यदि निर्धारित समय तक सभी लंबित मामलों का निपटारा नहीं हो पाया, तो अंतिम सूची जारी करने की तारीख आगे बढ़ सकती है। सीईओ कार्यालय के सूत्रों के मुताबिक, जरूरत पड़ने पर आयोग से समय बढ़ाने के लिए नया आवेदन भी किया जा सकता है।
दस्तावेज़ों को लेकर बढ़ा भ्रम और विवाद
चुनाव आयोग ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि एसआईआर के तहत केवल 13 प्रकार के मान्य दस्तावेज़ ही स्वीकार किए जाएंगे और सूची के बाहर किसी अन्य दस्तावेज़ को मान्यता नहीं दी जाएगी। इसके बावजूद कई मामलों में ऐसे दस्तावेज़ जमा किए गए, जिनका उल्लेख आधिकारिक सूची में नहीं है।
सूत्रों का दावा है कि कुछ स्थानों पर ऐसे दस्तावेज़ स्वीकार भी कर लिए गए, जिससे संबंधित अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठने लगे हैं।
चुनावी माहौल में बढ़ेगी राजनीतिक हलचल
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि अंतिम सूची से 10 लाख से अधिक नाम हटते हैं, तो इसका सीधा असर आगामी चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है। ऐसे में मतदाता सूची का यह पुनरीक्षण केवल प्रशासनिक प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि राज्य की राजनीति में भी एक बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि लंबित सत्यापन कार्य कब तक पूरा होता है और क्या आयोग तय समय पर अंतिम मतदाता सूची जारी कर पाएगा या फिर इसकी तारीख आगे बढ़ानी पड़ेगी।











