नई दिल्ली/आसनसोल:
देश में प्रस्तावित 12 फरवरी 2026 की राजनीतिक हड़ताल को लेकर जहां विभिन्न ट्रेड यूनियनों के बीच हलचल तेज है, वहीं नेशनल फ्रंट ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन्स (NFITU) ने स्पष्ट कर दिया है कि वह इस हड़ताल में शामिल नहीं होगा। संगठन ने इसे राजनीतिक उद्देश्यों से प्रेरित बताते हुए कहा कि श्रमिकों के मुद्दों का समाधान टकराव से नहीं, बल्कि संवाद और सहभागिता से ही संभव है।
NFITU के वरिष्ठ नेता बुम्बा मुखर्जी ने कहा कि संगठन श्रमिकों के वास्तविक हितों, औद्योगिक शांति, सामाजिक सुरक्षा और राष्ट्रीय हित के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि “हड़ताल अंतिम विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं। जब तक बातचीत और परामर्श के रास्ते खुले हैं, तब तक टकराव का रास्ता उचित नहीं।”

🤝 संवाद से समाधान की पैरवी
संगठन का मानना है कि श्रमिकों से जुड़े मुद्दों—जैसे वेतन, सुरक्षा, कार्यस्थल की गरिमा और सामाजिक सुरक्षा—पर सरकार और उद्योग प्रबंधन के साथ सकारात्मक वार्ता के माध्यम से स्थायी समाधान निकाला जा सकता है। NFITU ने कहा कि बार-बार की हड़ताल से उद्योग, आम जनता और स्वयं श्रमिकों को भी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
🏭 औद्योगिक शांति पर जोर
NFITU और इसके सहयोगी संगठनों ने अपने संयुक्त बयान में कहा कि देश के औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन के लिए स्थिरता और शांति आवश्यक है। संगठन ने अपने मूल मंत्र—सम्मानजनक कार्य, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय विकास—को दोहराते हुए श्रमिकों से संयम और सकारात्मक भूमिका निभाने की अपील की।

📢 राजनीतिकरण से दूरी
बुम्बा मुखर्जी ने यह भी कहा कि श्रमिक संगठनों को राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। उनका कहना था कि जब श्रमिक आंदोलन राजनीतिक रंग ले लेता है, तो मूल मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।
NFITU के इस फैसले के बाद श्रमिक संगठनों के बीच नई बहस छिड़ गई है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि 12 फरवरी की हड़ताल का देशभर में क्या असर पड़ता है और अन्य संगठन इस पर क्या रुख अपनाते हैं।











