कोलकाता : पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनाव में दशकों बाद मुस्लिम वोट बैंक पर सियासी महाभारत की जमीन तैयार हो गई है। टीएमसी के निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के शिलान्यास के बाद जनता उन्नयन पार्टी का गठन कर इसकी पटकथा तैयार कर दी है।
नई पार्टी के गठन के बाद कबीर ने एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और इंडिया सेक्युलर फ्रंट (आईएसएफ) के मुखिया पीरजादा अब्बास सिद्दीकी से संपर्क साधा है। गठबंधन को लेकर एआईएमआईएम का रुख सकारात्मक है, जबकि बीते चुनाव में कांग्रेस व वाम दलों के साथ गठबंधन करने वाले सिद्दीकी से बातचीत जारी है। दरअसल पश्चिम बंगाल की आबादी में मुसलमानों की हिस्सेदारी करीब 30 फीसदी है।
सौ सीटों पर व्यापक प्रभाव के कारण यह बिरादरी दशकों से राज्य की सत्ता की दशा और दिशा तय करती आ रही है। सत्तर के दशक में मुस्लिमों का कांग्रेस से मोहभंग होने के बाद वाम दलों की सरकार बनी। बाद में इसका वामदलों से मोहभंग हुआ तो तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई। अब इस नए संभावित सियासी समीकरण में तृणमूल कांग्रेस को इस बिरादरी की नाराजगी का डर सता रहा है।
माना जा रहा है कि हुमायूं, ओवैसी और अब्बास के साथ आने से मुस्लिम वोट बैंक तृणमूल कांग्रेस से छिटक सकता है। ओवैसी सीमांचल से लगते पश्चिम बंगाल के तीन जिलों मालदा, उत्तर और दक्षिण दिनाजपुर में प्रभावशाली भूमिका निभा सकते हैं। अब्बास की पार्टी का दक्षिण बंगाल में व्यापक प्रभाव है,जिसे तृणमूल कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। दो वर्ष पूर्व इनकी पार्टी ने दक्षिण बंगाल में ही 400 पंचायत सीटों पर कब्जा किया था। फिर हुमायूं मुर्शीदाबाद जिले से हैं। इस जिले के आसपास के जिलों में बाबरी मस्जिद के शिलान्यास का व्यापक असर दिखा था।
पार्टी का दशकों से पश्चिम बंगाल में सत्ता हासिल करने का सपना रहा है। हालांकि, मजबूत मुस्लिम वोट बैंक के अपने विरोध में एकतरफा ध्रुवीकरण के कारण बीते चुनाव में भाजपा को सफलता नहीं मिली। बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा और टीएमसी के मतों का अंतर करीब सात फीसदी था। विधानसभा चुनाव में यह अंतर करीब दस फीसदी था। ऐसे में अगर कबीर, ओवैसी और अब्बास की तिकड़ी बनती है तो टीएमसी के वोट बैंक में गिरावट भाजपा की सत्ता का रास्ता तैयार कर सकती है।
बिहार चुनाव में मुस्लिम राजनीति का एक नया रुझान सामने आया था। डेढ़ दशक तक महज मोदी-भाजपा विरोध के नाम पर कथित धर्मनिरपेक्ष दलों का समर्थन करते रहे मुलसमानों का विधानसभाओं और लोकसभा में प्रतिनिधित्व घट गया। इस बार चुनाव में ओवैसी ने कहा था कि मुसलमानों की समस्या का निदान और मुसलमानों का नेतृत्व मुसलमान ही करेगा। बिहार में ओवैसी की पार्टी का प्रदर्शन दर्शाता है कि खासतौर पर मुस्लिम युवाओं में अपने प्रतिनिधित्व को लेकर आकांक्षाएं बढ़ी हैं।











